मुक्तक/दोहा

मुक्तक

जीवन केवल बसन्त नही है, पतझड़ का होता साया,
पीत पत्र झड़ने के बाद ही, नव सृष्टि सृजन हो पाया।
जिसे मिला न दुःख का अनुभव, सुख को क्या जानेगा,
सुख दुःख सिक्के के दो पहलू, एक संग दूजा भी आया।

जन्म मृत्यु चक्र जीवन का, कर्म जहाँ पर नींव बने हैं,
यश अपयश भी संग रहते, रिश्तों का आधार बने हैं।
मानवता हो दीवारें घर की, संस्कारों की छत हो जाये,
सत्कर्मों का संचय होता, पुनर्जन्म का विश्वास बने हैं।

जन्म लिया है मृत्यु निश्चित, समय जगह सब निर्धारित,
कब तक जीना कब मरना है, काल समय कर्म आधारित।
संचित कर्म पूर्व जन्म के, वर्तमान जन्म निर्णायक बनते,
सत्कर्मों का संचय, हो आचार विचार व्यवहार मर्यादित।

— डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन