नीम करोली महाराज
संत नहीं, वे संदेश बने,
जन-जन के विश्वास बने,
अपने उजले कर्मों से वे,
युग-युग तक प्रकाश बने।
फिरोज़ाबाद की पावन धरती,
लक्ष्मण नारायण नाम मिला,
बाल-वय से प्रभु में रमे,
जीवन को श्रीराम मिला।
माया-मोह से मन को मोड़ा,
ईश्वर की राह पकड़ ली,
राम-नाम हृदय में रखकर,
जीवन की दिशा बदल ली।
पिता के कहने पर घर लौटे,
गृहस्थी का धर्म निभाया,
कर्तव्य-पथ पर चलते-चलते,
फिर प्रभु को जीवन सौंप आया।
तन पर केवल कंबल रहता,
मन में रहता राम का नाम,
सादा जीवन, निर्मल मन था,
हृदय बना प्रभु का धाम।
हनुमान-भक्ति प्राण बनी थी,
राम-स्मरण आधार रहा,
दीन-दुखी की सेवा करना,
जीवन का सच्चा सार रहा।
महिमा उनकी कौन बताए,
शब्द जहाँ सब हार गए,
जिसने प्रेम से नाम पुकारा,
उसके मन के द्वार खुले।
चमत्कारों की कितनी बातें,
भक्तों ने दोहराई हैं,
पर उनकी सबसे बड़ी महिमा,
टूटी आस जगाई है।
संदेश सरल, मगर था गहरा,
प्रेम करो हर प्राणी से,
सेवा को अपना धर्म बनाओ,
जुड़े रहो भगवान से।
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें प्रभु का नूर रहे,
जिस हृदय में प्रेम जगा हो,
वहीं सदा भरपूर रहे।
पर्वत की शांत गोद में,
कैंची धाम बसाया है,
जिसने श्रद्धा से कदम रखा,
विश्वास नया पाया है।
दूर-दूर से भक्त हैं आते,
मन में आस सजाकर,
महाराजजी की स्मृति में वे,
शांति की राह तलाशते हैं।
स्टीव जॉब्स हों या जुकरबर्ग,
कैंची धाम से जुड़े रहे,
इस पावन आध्यात्मिक धारा से,
कितने मन प्रेरित हुए।
वृंदावन में देह छूटी,
ज्योति मगर बुझी नहीं,
समय बदला, युग भी बदले,
उनकी सीख कभी मिटी नहीं।
आज भी उनकी वाणी कहती,
भक्ति केवल पूजा नहीं,
जहाँ प्रेम हो, सेवा हो,
उससे बड़ी साधना नहीं।
आओ उनके पथ पर चलकर,
मन का तम हर लें हम,
दुखियों के जीवन में बनकर,
आशा का दीप धरें हम।
प्रेम बने जीवन की भाषा,
सेवा बने संस्कार,
राम-नाम हो हृदय में अपने,
यही जीवन का सार।
अपने कर्मों में प्रेम जगाएँ,
सेवा से संसार सजाएँ,
राम-नाम हृदय में बसाकर,
जीवन अपना धन्य बनाएँ।
प्रेम रहे हर साँस में अपनी,
सेवा हो हर काम,
हृदय-हृदय में ज्योति जले,
मुख पर हो, श्रीराम! श्रीराम!
✍️ रूपेश कुमार
