कविता

।। आओ देवी ।।

आओ देवी,
और थोड़ा लाल हो जाए
विश्वास का मेढ़।
काँटी-कूटी और कीचड़ की परत के नीचे
संचारित हो असली रक्त ।
विसर्जन नहीं चाहते माँ,
तुम्हारा आवाहन करते हैं
विनाश करो युगों-युगों के पापों को ।

तुम घोड़े पर आओ या
नाव पर आओ,
दशमी तिथि में आओ या
द्वादशी तिथि में आओ—
पूर्व दिशा के आकाश में उदित हो
नवीन अरुणिमा।
सत्य की यज्ञ अनल में
पूर्णाहुति हो
असत्य से भरा सहर की।

आओ देवी,
अपनी ही सृष्टि को
अपने इच्छाओं के वलय में आबद्ध कर लो।
सारे बगीचे में झुलाकर रखो दो
नैवेद्य के फूल
और छलना के चौराहे पर
विलुप्त हो जाएँ
जितने सारे छद्मवेशियाँ ।


मूल रचना : सुरंजन पात्र
अनुवाद : सस्मिता राउत

सस्मिता राउत

ओड़िया कवयित्री, कथाकार और अनुवादक (वकील) सा/पो - सोरो जिला - बालेश्वर राज्य - ओड़िशा पिन नं- ७८९४७२२६४३ मो: नं- ७९७८४०९८२९ sasmitaroutadv@gmail.com