पिता को श्रद्धांजलि
एक बरस बीत गया तुम्हें गए,
पर मैंने तुम्हें याद नहीं किया-
क्योंकि मन की स्मृतियों में
मैंने तुम्हें विदा… है नहीं किया।
तुम्हारी सबसे अनमोल अमानत “माँ”
आज भी हमारे साथ है;
उसकी ममता की छाँव में अब
तुम्हारे स्नेह का एहसास है।
जब कभी आँखों में मेरी
अनकहा डर उतर आता है,
माँ के कोमल हाथों में
तुम्हारा “दृढ़ निश्चय” नज़र आता है।
माँ के स्नेहिल आँचल में
तुम्हारा आशीष मैं पाती हूँ,
उसी में दिखते हो तुम अब,
तुम्हारी यादों में खो जाती हूँ।
— अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
