कविता

कविता

तेरे खेल निराले
आनंद उत्साह और अवसाद
सब कुछ तेरे हवाले
मन मर्जी चलती कहां
अदृश्य शक्ति
विचरण करते यहां-वहां
तुम हमें संभालते
अहंकार को ग्रास बनाते
स्वाभिमान का पाठ पढ़ाते
निर्बल नहीं मानव तन
अक्सर ऐसे भाव जगाते ।
व्रत-उपवास और पूजा-पाठ से
संयम का तुम पाठ पढाते ।
तृष्णा लुप्त हो रही
तृप्ति संगिनी बन रही
अमुल्य धन है संतोष धन
स्थिर हो जाये जब चंचल मन ।

— आरती रॉय

*आरती राय

शैक्षणिक योग्यता--गृहणी जन्मतिथि - 11दिसंबर लेखन की विधाएँ - लघुकथा, कहानियाँ ,कवितायें प्रकाशित पुस्तकें - लघुत्तम महत्तम...लघुकथा संकलन . प्रकाशित दर्पण कथा संग्रह पुरस्कार/सम्मान - आकाशवाणी दरभंगा से कहानी का प्रसारण डाक का सम्पूर्ण पता - आरती राय कृष्णा पूरी .बरहेता रोड . लहेरियासराय जेल के पास जिला ...दरभंगा बिहार . Mo-9430350863 . ईमेल - arti.roy1112@gmail.com