कविता

कविता- कैसे कहूं?

मन में मेरे कहने को है बहुत कुछ,
कैसे कहूं? कुछ समझ न पाऊं,
मन में रखूं तो मन रूठ जाता है,
बाहर कहूं तो जग को रुठा हुआ पाऊं!
लिखने बैठूं तो सोच में पड़े कलम,
क्या लिखूं, किस विधा में लिखूं,
मन के भावों को सच्चाई से व्यक्त करूं,
या कटु सत्य से किनारा करती दिखूं!
मन है चंचल-चपल, मन ही समझदार भी,
उलझाता है, सुलझाता है, करता खबरदार भी,
किसी को परखे बिना मन के राज मत खोलना,
वरना रह नहीं पाओगे प्यारे खुद के राजदार भी।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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