ख़ामोशी ही इश्क की महकती हुई सुगन्ध है
धीरे से उतरती है
रात की रेशमी चादर पर
तुम्हारी याद की आहट
बोलते नहीं लफ़्ज़
फिर भी बहुत कुछ कह जाते हैं
नज़रों की जुबान में
जहाँ शब्द थक जाते हैं
वहीं से शुरू होती है
इश्क की असली कहानी
ख़ामोशी के दामन में
छुपा होता है
दिल का सबसे सच्चा रंग
हर धड़कन में
तुम्हारा नाम नहीं
तुम्हारा एहसास बसता है
हवा भी जब गुजरती है
तो जैसे
तुम्हें छूकर लौटती है
मैं सुनता हूँ
बिना आवाज़ के भी
तुम्हारी मौजूदगी को
ये जो ठहराव है
यही तो असली संगीत है
प्रेम का अदृश्य राग
चाँद भी चुप है आज
शायद वो भी
इश्क में डूबा हुआ है
ख़ामोशी की इस भाषा में
सबसे गहरी बातें
सबसे हल्की होकर उतरती हैं
और अंत में
सब कुछ शांत होकर भी
बहुत कुछ कह जाता है
ख़ामोशी ही इश्क की महकती हुई सुगन्ध है
— डॉ. अशोक
