तस्वीर देखते ही
शाम ढल रही थी, और रेलवे स्टेशन के पुराने पीपल के पेड़ पर परिंदों का शोर धीरे-धीरे थम रहा था। फ़ारूख हमेशा की तरह स्टेशन के आखिरी बेंच पर बैठा चाय की प्याली हाथ में लिए पटरियों को घूर रहा था। यह रेलवे स्टेशन फ़ारूख के लिए सिर्फ़ एक जगह नहीं, बल्कि यादों का एक मज़ार था। यह वही जगह थी जहाँ बीस साल पहले उसका हाथ सबा के हाथ से छूटा था, और फ़िर वे दोनों हमेशा के लिए दो अलग पटरियों के मुसाफ़िर हो गए थे।
सबा और फ़ारूख की मोहब्बत कॉलेज के दिनों से थी। सबा बेहद संवेदनशील और जज्बाती लड़की थी, जबकि फ़ारूख शायरी का दिलदाद और खामोश मिजाज इंसान। दोनों ने साथ जीने-मरने के वादे किए थे, लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक छोटी सी गलतफ़हमी जो सबा के दिल में किसी ने बोई थी कि फ़ारूख उसे छोड़कर शहर जा रहा है,उसने ऐसा तूफ़ान खड़ा किया कि सबा ने बिना कुछ सुने, इसी स्टेशन पर फ़ारूख का दिया हुआ लॉकेट गुस्से में लौटा दिया था और हमेशा के लिए मुँह मोड़ लिया था। फ़ारूख ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, पर सबा ने एक न सुनी। उस दिन के बाद से फ़ारूख की ज़िंदगी जैसे इसी स्टेशन पर थम सी गई थी।
उसके बिल्कुल बराबर में, बेंच के दूसरे कोने पर एक नौजवान लड़का और लड़की बैठे थे। दोनों के चेहरों पर नाराजगी और खामोशी थी,एक ऐसी ख़ामोशी जो अक्सर बड़े तूफ़ान से पहले आती है। शायद उनके दरम्यान भी बिछड़ने की कोई लकीर खिंच चुकी थी।
अचानक, लड़की ने अपने पर्स से रूमाल निकाला, तो बेंच के पास दाना चुगते हुए दो कबूतर डरकर उड़ गए। लड़की ने तल्ख़ी से मुस्कुराकर कहा, “देखा! जरा सी आहट से उड़ गए। परिंदे हों या इंसान, सबको एक न एक दिन उड़ ही जाना होता है। कोई साथ नहीं रहता।”
लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी नजरें झुका लीं।
फ़ारूख, जो ख़ामोशी से यह सब देख रहा था, उसके दिल में एक कसक सी उठी। उसे अपना और सबा का वह आख़िरी लम्हा याद आ गया जब सबा भी इसी तरह नाराज़ होकर चली गई थी। उसने अपनी चाय की प्याली साइड पर रखी, उनकी तरफ़ देखा और अत्यंत नरमी से बोला:
“बेटा! जो लोग जानते हों बिछड़ जाने का दुख, वो साथ बैठे हुए परिंदों को उड़ाया नहीं करते।”
दोनों चौंककर फ़ारूख़ की तरफ़ देखने लगे। फ़ारूख की आँखों में एक पुरानी उदासी और मोहब्बत की चमक थी।
उसने बात जारी रखते हुए कहा, “मोहब्बत तो वो धागा है जो उड़ते हुए परिंदों को भी वापस खींच लाता है। परिंदे तो नादान हैं, जरा सी ठेस पर उड़ जाते हैं, लेकिन अगर मोहब्बत सच्ची हो तो वो घबराकर उड़ने वाले परिंदे को भी दोबारा उसी शाख़ पर बैठने का हौसला देती है। बिछड़ना बहुत आसान है, एक सेकंड का फ़ासला और उम्र भर की दूरी। लेकिन इस दुख़ को झेलना बहुत मुश्किल है। अगर दिल में जरा सी भी गुंजाइश है, तो इस साथ को उड़ने मत दो।”
फ़ारूख की बातों में एक अजीब सा सहर (जादू) था, जैसे कोई बुज़ुर्ग जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखा रहा हो। लड़की ने कबूतरों की ख़ाली जगह को देखा, और फ़िर उसका हाथ धीरे से सरककर लड़के के हाथ पर जा टिका। लड़के ने मजबूती से उसकी उंगलियों को थाम लिया।
दोनों के चेहरों पर जमी बर्फ़ पिघल चुकी थी और मोहब्बत का एहसास वापस लौट आया था। उन्होंने फ़ारूख का शुक्रिया अदा किया और ट्रेन आने पर एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए आगे बढ़ गए। ट्रेन के हॉर्न के साथ ही वह लड़का दौड़कर अपनी बोगी में सवार होने ही वाला था कि अचानक तेज़ क़दमों से वापस पलटा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी और अपनापन था।
वह फ़ारूख के सामने आकर रुका, जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और फ़ारूख के हाथ में थमाते हुए धीमी, जज़्बाती आवाज में बोला।
“अंकल, आपकी बातों ने मुझे एक बहुत बड़े पछतावे से बचा लिया। सच तो यह है कि मैं अपने बुज़ुर्ग वालिद (पिता) को छोड़कर हमेशा के लिए शहर जा रहा था, जिनसे मैं बरसों से नाराज था। लेकिन अब मैं उनके पास वापस जाऊँगा। यह मेरा पता है। आप जब भी शहर आएँ, हमारे घर ज़रूर आइएगा। मुझे और मेरे वालिद को बहुत खुशी होगी।”
फ़ारूख ने मुस्कुराकर कार्ड ले लिया। ट्रेन धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गई। फ़ारूख ने कार्ड पर सरसरी नजर डाली, अंधेरे की वजह से धुंधला सा नाम “जैन” नजर आया। उसने कार्ड जेब में रखा और अपने घर की तरफ़ चल दिया।
कुछ दिन गुजर गए। फ़ारूख को किसी निजी काम से उसी शहर जाना पड़ा जहाँ वह लड़का रहता था। शहर की गहमागहमी में अचानक उसे अपनी जेब में रखा वह कार्ड याद आया। उसने सोचा कि क्यों न उस नौजवान से मिलकर उसकी ख़ैरियत दरियाफ़्त (मालूम) की जाए और देखा जाए कि बाप-बेटे के ताल्लुकात अब कैसे हैं।
जब फ़ारूख कार्ड पर लिखे पते को ढूँढ़ता हुआ एक पुरसुकून और आलीशान मोहल्ले के एक मकान के सामने पहुँचा, तो उसका दिल नामालूम खौफ़ और सस्पेंस से धड़कने लगा। घर के बाहर लगी संग-ए-मरमर की नेमप्लेट पर लिखा था।
“सबा मंजिल
“सबा…” फ़ारूख के कदम वहीं जम गए। यह नाम उसके लिए एक जीते-जागते इंसान की तरह था, जिसकी यादें वह रोज ओढ़ता-बिछाता था।
उसने कांपते हाथों से दरवाजे की घंटी बजाई। चंद लम्हों बाद दरवाजा खुला, तो सामने वही नौजवान—जैन—खड़ा था। फ़ारूख को देखकर जैन की आँखें खुशी से चमक उठीं: “अंकल! आप? अरे वाह, आप सचमुच आ गए। अंदर आइए, प्लीज अंदर आइए!”
फ़ारूख एक सहर (मूर्च्छा) की कैफ़ियत में अंदर दाख़िल हुआ। ड्राइंग रूम में कदम रखते ही उसकी नजर सामने दीवार पर लगी एक बड़ी सी तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर देखते ही फ़ारूख के पाँवों तले से जमीन निकल गई, हाथ में पकड़ा हुआ बैग नीचे गिर गया और उसका दिल जैसे सीने में धड़कना भूल गया।
दीवार पर सबा की तस्वीर लगी थी, जिस पर चंदन का हार चढ़ा हुआ था, और उसके बराबर में एक बूढ़े शख्स की तस्वीर थी—जिसका चेहरा किसी हद तक जैन से मिलता था, लेकिन उस तस्वीर पर भी काली पट्टी बंधी थी।
जैन ने फ़ारूख की हैरत और सदमे को भाँपते हुए उदासी से सर झुकाया और कहा:
“अंकल, ये मेरी अम्मी सबा हैं, जिनका इंतकाल मेरी पैदाइश के कुछ साल बाद ही हो गया था। वो हमेशा कहती थीं कि उन्होंने जिंदगी में एक परिंदे को अपने हाथ से उड़ाया था, जिसका दुख उन्हें जिंदगी भर रहा। और ये मेरे अब्बू हैं… जिनसे नाराज होकर मैं घर छोड़कर चला गया था। आपकी बात सुनकर मैं वापस तो आया, लेकिन मेरे पहुँचने से महज दो घंटे पहले उनका हार्ट अटैक से इंतकाल हो गया था। मैं उनसे माफ़ी भी न मांग सका। अब इस घर में सिर्फ़ मैं और अम्मी-अब्बू की यादें ही बाकी हैं।
फ़ारूख की नज़रें दीवार पर लगी उस बूढ़े शख्स की तस्वीर पर टिकी हुई थीं जिसे जैन अपना वालिद कह रहा था। फ़ारूख के चेहरे पर हैरत के साए गहरे होते जा रहे थे। वह सबा के ख़ानदान को जानता था, उसके अतीत को जानता था। वह गौर से उस तस्वीर को देखने लगा। अचानक उसके जेहन के बंद दरीचे खुले और उसने पहचान लिया।
,यह शख़्स सबा का शौहर नहीं, बल्कि सबा के सगे बड़े भाई (जैन के मामू) थे!
सबा ने अपने भाई की शफ़कत (स्नेह) और समाज के डर की वजह से कभी जैन को यह एहसास ही नहीं होने दिया था कि उसका असल बाप कोई और है, क्योंकि दुनिया की नज़र में तो सबा का असल हमसफ़र बरसों पहले कहीं खो गया था।
फ़ारूख ने कांपती हुई आवाज में पूछा, “जैन… तुम्हारी अम्मी ने तुम्हें कभी अपने अतीत के बारे में… या तुम्हारे असल वालिद के बारे में कुछ बताया था?”
जैन ने सदमे से सर हिलाया, “नहीं अंकल। अम्मी बस अक्सर रोते हुए एक पुरानी डायरी अपने सीने से लगा लिया करती थीं और कहती थीं कि मेरा असल बाप इस दुनिया का सबसे संवेदनशील इंसान है, जिसे वो एक गलतफ़हमी की वजह से रेलवे स्टेशन पर तनहा छोड़ आई थीं। अम्मी के इंतकाल के बाद, मेरे मामू ने ही मुझे पाला, इसलिए मैं उन्हें ही अपना सब कुछ मानता था।”
जैन ने अलमारी से वह पुरानी, मखमली डायरी निकाली और फ़ारूख के हाथ में थमा दी। जैसे ही फ़ारूख ने डायरी खोली, उसके अपने हाथ का लिखा हुआ पहला शेर सामने था।
जो लोग जानते हों बिछड़ जाने का दुख…
फ़ारूख ने कांपते हाथों से उसके सफ़हे (पन्ने) पलटे। डायरी के बिल्कुल आखिरी पन्ने पर एक छोटा सा लिफाफा गोंद से चिपका हुआ था। फ़ारूख ने धड़कते दिल के साथ उस लिफ़ाफ़े को खोला तो उसके अंदर से एक अत्यंत पुरानी, ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर निकली।
यह तस्वीर बीस साल पुरानी थी, जिसमें कॉलेज के दिनों का फ़ारूख और सबा एक दूसरे के साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे। फ़ारूख के बाल घने थे और चेहरे पर जवानी की शोखी थी, लेकिन नक्श बिल्कुल वही थे।
जैन ने जब फ़ारूख के हाथ में वह तस्वीर देखी, तो वह तड़पकर आगे बढ़ा। उसने पहले तस्वीर में मौजूद नौजवान फ़ारूख को देखा, और फिर सामने खड़े सफ़ेद बालों वाले बूढ़े फ़ारूख के चेहरे को ग़ौर से देखा। नक्श, आँखों की चमक और मुस्कुराहट की बनावट बिल्कुल एक जैसी थी। जैन के पास अब शक की कोई वजह नहीं थी, लेकिन क़ुदरत ने एक और बड़ा सबूत अभी सामने लाना था।
फ़ारूख ने तस्वीर के साथ ही लिफ़ाफ़े के अंदर से चाँदी का एक पुराना, गोल लॉकेट निकाला। वह लॉकेट देखते ही जैन ने बेसाख़्ता (अचानक) अपने गले पर हाथ रखा। उसने अपने शर्ट के अंदर से बिल्कुल वैसा ही, हू-ब-हू चाँदी का लॉकेट निकाला जो वह बचपन से पहनता आ रहा था।
सबा के पास ऐसे दो लॉकेट थे, जिन पर एक ख़ास ज्यामितीय डिजाइन बना हुआ था। एक लॉकेट सबा ने बिछड़ने से पहले फ़ारूख को दिया था, और दूसरा अपने बेटे जैन के गले में डाल दिया था, इस उम्मीद के साथ कि कभी अगर ये दोनों मिले, तो ये निशानियाँ उन्हें मिला देंगी।
जैन ने अपने गले का लॉकेट उतारा और फ़ारूख के हाथ में मौजूद लॉकेट के बराबर में रखा। दोनों लॉकेट एक दूसरे में बिल्कुल फिट हो गए, जैसे एक ही दिल के दो टुकड़े हों।
तस्वीर का वह चेहरा और उन दोनों लॉकेट्स का मिलाप यह वह अंतिम सबूत था जिसने जैन के दिल में मौजूद हर शक को दूर कर दिया। उसे पूरा यक़ीन हो गया कि सामने खड़ा शख़्स कोई अजनबी नहीं, बल्कि उसका अपना ख़ून, उसका अपना वालिद (पिता) है।
फ़ारूख अभी इस सच्चाई के तूफ़ान को संभाल ही रहा था कि घर का दरवाजा खुला। अंदर वही लड़की दाख़िल हुई जो उस दिन स्टेशन पर जैन के साथ थी। उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता था और चेहरे पर एक अजीब सा सुकून।
जैन ने आँसू पोंछते हुए कहा, “अंकल… नहीं! अब्बू! यह ‘आलिया’ है। उस दिन स्टेशन पर हम दोनों इसलिए लड़ रहे थे क्योंकि मैं अपने मामू से नाराज होकर हमेशा के लिए शहर छोड़ कर जा रहा था और आलिया मुझे रोकने आई थी। यह मेरी कजिन है (मामू की बेटी), और मेरी मंगेतर भी। उस दिन आपकी बात सुनकर मैं वापस तो आया, लेकिन मामू को जिंदा न पा सका। आलिया भी इस पछतावे में मेरे साथ रोती रही है कि काश हम चंद घंटे पहले आ जाते।”
आलिया ने आगे बढ़कर फ़ारूख के उदास और आँसूओं से तर चेहरे को देखा, और फिर उसकी नज़र उस डायरी और लॉकेट पर पड़ी जो फ़ारूख के हाथों में कांप रहे थे। वह सब समझ गई।
आलिया ने धीमी आवाज में जैन से कहा, “जैन… पछतावे के सारे गम अब बह जाने चाहिए… क्योंकि पापा (मामू) मरने से पहले अक्सर मुझसे कहते थे कि सबा फूफी का असल हमसफ़र एक दिन अपने बेटे को ढूँढ़ते हुए जरूर आएगा। जैन, गौर से देखो… ये वही हैं जिनका जिक्र फूफी अपनी डायरी में करती थीं!”
जैन ने तड़पकर फ़ारूख की तरफ देखा। फ़ारूख ने रोते हुए अपनी बाहें फैला दीं: “हाँ जैन… मैं ही तुम्हारा बदकिस्मत बाप हूँ… जो बीस साल से इस बिछड़ने के दुख को सीने से लगाए जी रहा था।”
जैन “अब्बू!” कहकर फ़ारूख के सीने से लग गया और फूट-फूट कर रो पड़ा। फ़ारूख ने उसे अपने सीने से ऐसे भींच लिया जैसे वह बीस साल की जुदाई का एक-एक पल मिटा देना चाहता हो।
आज पछतावे, उदासी और जुदाई के सारे गम आँसूओं की शक्ल में बह चुके थे। आलिया ने दीवार पर लगी सबा और अपने वालिद की तस्वीर की तरफ देखा, जहाँ अब एक अनदेखी मुस्कुराहट और सुकून का एहसास था।
बरसों पहले जो परिंदा एक गलतफ़हमी की वजह से उड़ गया था, आज उसका बच्चा अपने असल घोंसले में वापस लौट आया था, और अब बिछड़ने का कोई दुख, कोई पछतावा बाकी नहीं रहा था। अतीत के सारे जख्म आज के इस खूबसूरत मिलाप के आँसूओं में हमेशा के लिए धुल चुके थे।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
