गजल
जहरीली हवा घुटती जिंदगानी दोस्तों ।
यही है नये दौर की कहानी दोस्तों ।।
पर्वतों पे देखो कितने बांध बन गये ।
जवां नदी की गुम हुई रवानी दोस्तों ।।
विज्ञान की तरक्कियों ने चिड़ियां मार दीं।
अब भोर चहकती नहीं सुहानी दोस्तों ।।
चारों ओर धुएं की हैं परतें जम रहीं।
अंबर से बरसेगा जहरीला पानी दोस्तों ।।
बर्बादियां निशान अपने छोड़ जाएंगी।
कुदरत पे कब्जा करने की जो ठानी दोस्तों।।
कुदरत के कहर बढ़ गये हैं आज उतने ही ।
जितनी बढ़ी लोगों की मनमानी दोस्तों ।।
पेड़ थे परिंदे थे झरते हुए झरने ।
किताबों में रह जाएगी कहानी दोस्तों ।।
बंजर धरा विषैला पानी और यह धुआं।
इक दिन करेंगे सभ्यताएं फानी दोस्तों।।
कुदरत जो रूठ गई आदमी के स्वार्थ से।
तो न बचेगा राजा न ही रानी दोस्तों।।
— अशोक दर्द
