बोझ
दिल का बोझ हल्का करने
रोना चाहता हूं आज जी भरकर
दर्द जो सीने में छुपा है
खत्म हो जाए यूं धीरे बहकर
नहीं रोकना चाहता इन आंसुओं को
बहने से मिलेगा बहुत सुकून
हर बूझा एहसास टूटेगा धीरे
क्यूं न उसे बहने दे, धीरे धीरे
खुद से भी अब मिल नहीं पाता
मैं कहां हूं, मुझे यह पता नहीं
आईना समझ देखा सबने अक्स अपना
मैं कैसा हूं, मुझे यह पता नहीं
खुशियों से जल्दी मुलाकात नहीं होती
साथ निभाते हैं तन्हाई अक्सर
हर चाहत पूरी नहीं होती
बस चुप रहता हूं, यह सोचकर
नींद पलकों में कम आती है आजकल
आंखों ने सपना देखना छोड़ दिया
आखिरी सांस तक रिश्ता बना रहे
यही बहुत है अब मेरे लिए
— श्याम सुन्दर मोदी
