तालियों से सन्नाटे तक
सत्ता के शिखरों पर जो दीपक जलते थे,
आज वही धुएँ में अपने निशान ढूँढ़ते हैं।
भीड़ की तालियों से “गूँजते” थे जो रास्ते,
अब प्रश्नों की आहट से “सन्नाटे” टूटते हैं।
असंतोष की चिंगारी भीतर जन्म लेती है,
तो महलों की दीवारें भी दरकने लगती हैं।
विश्वास का धागा यदि कमजोर पड़ जाए,
मजबूत दिखती नावें यूं भटकने लगती हैं।
नेतृत्व का भार केवल कुर्सी का नाम नहीं,
यह मनों को जोड़ने का कठिन दायित्व है।
जहाँ संवाद मौन हो जाए व अहंकार बढ़े,
वहीं से शुरू होता “संकट” का अस्तित्व है।
समय का न्याय बड़ा निष्ठुर एवं निष्पक्ष है,
वह हर शक्तिशाली की परीक्षा ले लेता है।
जो टूट के भी स्वयं को फिर से खड़ा करे,
इतिहास उसे ही एक नव अध्याय देता है।
राजनीति हो या जीवन का कोई भी मार्ग,
यहाँ विश्वास ही सबसे बड़ी पूँजी होता है।
जन-जन में मन से दूरियाँ बढ़ने लगती है,
वैभव का हर शिखर भी “अधूरा” होता है।
— संजय एम तराणेकर
