दीपक की लौ
अँधेरी रात में, एक दीपक मुस्काया, तम ने सिर झुकाया।
नन्ही-सी लौ में, उम्मीदों का आकाश, जगमग विश्वास।
हवा ने छेड़ा, लौ ने फिर भी कहा, मैं नहीं बुझूँगा।
तेल की बूँदें, जीवन का समर्पण, प्रकाश का अर्पण।
मिट्टी का तन, भीतर उजियारा है, यही सहारा है।
निशा के आँचल, स्वप्नों के दीप जले, पथ स्वयं खुले।
लौ की भाषा, मौन में कहती बात, जीवन की सौगात।
तूफान आए, हौसला मत खोना, जलते ही रहना।
एक छोटी लौ, सौ सूरज का साहस, अंधकार पर विजय।
दीपक जलता, खुद को तिल-तिल खोकर, जग को रोशन कर।
भोर की पहली, किरण ने जब छुआ, तम कहीं न रहा।
लौ ने सिखाया, जीवन का अर्थ यही, बाँटो रोशनी।
जब तक साँसें, आशा का दीप जले, राहें खिल उठें।
न बुझने देना, मन के भीतर की लौ, यही जीवन-ज्योति।
— डॉ. अशोक, पटना
