रूप चौदस
विधा- कविता
शीर्षक- रूप चौदस
रूप चौदस की भोर सुहानी है आई,
अपने साथ खुशियों की बेला लाई।
तन-मन को निखारने की घड़ी आई,
उबटन-हल्दी की भीनी-सी महक छाई।
श्री कृष्ण से नरकासुर था हारा,
अंधेरों पर हावी हुआ उजियारा।
घर-घर में दीपों ने किया उजाला,
जन-जन खुशी से हुआ मतवाला।
रूप न केवल चेहरे की शोभा बढ़ाए,
मन की आभा ही रूप सौन्दर्य कहलाए।
उम्मीद-क्षमा-संवेदना के दीप जलें,
अंधेरों की कोख में उजियारे पलें।
मन स्वच्छ करने का संकल्प लेना है,
ईर्ष्या-द्वेष के तम को दूर कर देना है।
रूप चौदस की सबको हो बधाई,
सौंदर्य विजय पर्व की पावन बेला आई।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
