कविता: अपनी परिधि में…
अपनी परिधि में… सिमटते, सिकुड़ते ! कई बार चाहा… इसे तोड़ पाऊँ ! जिम्मेदारियों के बंधन, जो बाँधे हैं मुझको
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Read Moreपत्तों की भाँति जब बिखरे विश्वास नम आँखें कहें… दर्द होता है !! अपना बना के जब करे कोई रुसवा
Read Moreजब भी मिलना चाहें… मूंद लेते हैं आँखें हर रोज़ ख्वाब में आएँ… ये ज़रुरी तो नहीँ !! अश्कों संग
Read Moreधर काली का रोंद्र रुप, अंग्रेजों का संहार किया ! मातृभूमि की रक्षा हेतु, दुर्गा का अवतार लिया ! !
Read Moreझुलसा चेहरा, धंसी आँखें, “एसिड विक्टिम”… है मेरी पहचान ! पलक बिछाये, था सुनहरा कल, अब शायद हूँ… कुछ दिन
Read Moreटूटे मर्यादा… दिन – रैना क्यों “रामा” अब तेरे देश में ! रिश्तों में धोखा… इंसा दे रहा आदमी के
Read Moreकर खुद को… नज़रों से ओझल क्या दिल से दूर हो जाओगे ? पाओगे जब… खुद को तन्हा, संग अपने
Read Moreनाजुक सा रिश्ता…. तेरा मेरा ————————– नाजुक सा रिश्ता, तेरा मेरा कसमों से परे, बंधनों से परे !! इक डोर
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