कविता : तरु शिखा पर झूलते कल्पित सपन
तरु शिखा पर झूलते कल्पित सपन दरिद्र आकांछाएं चूमती नील गगन चहकती अंगना भर जीवन संगीत अदृश्य कड़ियों जकड़ी टूटे
Read Moreतरु शिखा पर झूलते कल्पित सपन दरिद्र आकांछाएं चूमती नील गगन चहकती अंगना भर जीवन संगीत अदृश्य कड़ियों जकड़ी टूटे
Read More1 साज़न तेरी यादें सावन बन बरसी तोड़ दिए सब वादे । 2 नभ भी रो पड़ता है दुःख के
Read Moreभोर आलोक वसंत नव जीवन स्पन्दन मुक्त प्राण तमस विहग राग अनुराग हल्की मधुर बयार अतीत में दबी स्मृतियाँ आलिंगन
Read More1 मात शारदे विद्या बुद्धि संयम झोली भर दे । 2 वसंतोत्सव सरस्वती वन्दन प्रकृति पर्व । 3 अवतरण विद्या
Read Moreहाथों में छाले किस्मत की अभागी रोटी की लाले । बनो तो सही आस की एक ज्योति सुख है वही
Read Moreलक्ष्य भेदना सिन्धु आत्मविश्वास ऊर्जा चेतना । छुपा रहस्य अद्वितीय सरस मोहक दृश्य । अनूठी निष्ठा वेदना पराकाष्ठा प्रेरक चेष्ठा
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