मुक्तक
सुबह साँझ के फेर में जल गयी देखो छाँव धूल उड़ाते फिर रहे है हवा के नाज़ुक पाँव पीपल बरगद
Read Moreगुंजन अग्रवाल 1 शर्मीला चाँद सिन्धु तट उतरा मेघों की ओटI 2 जीव इच्छाएँ सागर सी अथाह रही अधूरी/ होती
Read Moreप्रेम की परिभाषा कभी विरह तो कभी मिलन नए तराने नए अफ़साने वो उलझे रिश्ते आये न जो तुम कभी
Read More1 फूटने लगा ललछौंहा उजास पूरबी छोर । 2 प्यासा पादप ताके अंतिम क्षण बरसो मेघ । 3 खिला सुमन
Read Moreआसमान को देखकर , बेटी भरे उड़ान माँ के दिल में हो रही , आशंका बलवान ।। रिझा रहा हिय
Read Moreसाजन तेरी यादें सावन बन बरसी तोड़ दिए सब वादे । नभ भी रो पड़ता है दुःख के बोझ तले
Read More1 भीगी है चोली सुलगा तन मन विरही होली । 2 होली में लाल रंग नहायी पिया खुश्बू तू ख्याल
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