पहाड़ों के ढलानों पर
बनाये नीड़ हैं हमने, पहाड़ों के मचानों पर उगाते फसल अपनी हम, पहाड़ों के ढलानों पर मशीनों से नहीं हम
Read Moreबनाये नीड़ हैं हमने, पहाड़ों के मचानों पर उगाते फसल अपनी हम, पहाड़ों के ढलानों पर मशीनों से नहीं हम
Read Moreगहन अमावस में प्रकाश से गेह खिले हैं। त्याग-तपस्या की बाती को स्नेह मिले हैं। जगमग सजी दिवाली हर घर
Read Moreशरदपूर्णिमा है जब आती। चमक चाँद की तब बढ़ जाती।। धरती पर अमृत टपकाता। इसका सबको “रूप” सुहाता।। नभ में
Read Moreश्रद्धा से ही कीजिए, निज पुरुखों को याद। श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद।। — आदिकाल से चल
Read Moreबैरी है ललकारता, प्रतिदिन होकर क्रुद्ध। हिम्मत है तो कीजिए, आकर उससे युद्ध।। — बन्दर घुड़की दे रहा, हो करके
Read Moreखिल उठे फिर से बगीचे में सुमन। छँट गये बादल हुआ निर्मल गगन।। उष्ण मौसम का गिरा कुछ आज पारा,
Read Moreदशकों से आतंक को, देश रहा है झेल। सही समय अब आ गया, मेटो इनका खेल।। — करो चढ़ाई पाक
Read Moreभौंहें वक्र-कमान न कर लक्ष्यहीन संधान न कर ओछी हरक़त करके बन्दे दुनिया को हैरान न कर दीन-धर्म पर करके
Read Moreघर-आँगन वो बाग सलोने, याद बहुत आते हैं बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं जब हम गर्मी में
Read Moreचीख-चीखकर आजादी, करती है आज सवाल। हुआ क्यों जन-जीवन बेहाल? दुखी क्यों लाल-बाल औ’ पाल? चीख-चीखकर आजादी, करती है आज
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