ज़माने की भीड़ में अकेला
इतनी भीड़ बढ़ रही है इस ज़माने में,लोग उतने ही अकेले होते जा रहे हैं।चेहरों का मेला ‘हर मोड़’ पर
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Read Moreयहाँ रेत के हर कण में एक कहानी सोई है,घुड़लो की परंपरा में नारी की लाज रोई है।साँझ ढ़ले गाँव
Read Moreसुबह की पहली किरण के संग,कंधे पर उम्मीदों का बोझ लिए,निकल पड़ता है वह चुपचापगली-गली में अपना रोज़ लिए।“झाड़ू ले
Read Moreजब जनता का “मिज़ाज” बदल जाए अचानक,वोटों की नाव डूबने लगे नया बनाओ कथानक।नेताजी के चेहरे पर आए मुस्कान जागे
Read Moreआओ करें सब “मुक्ति की प्रार्थना”,तेरह साल से हरीश की हैं “वेदना”।उनकी साँसें अभी-भी रहीं थीं चल,कहीं खोई ज़िन्दगी कट
Read Moreगैस टंकी चार को बुक कराई,सात को कीमत बढ़कर आई।यहाँ साठ रुपए की मार पड़ी,जेब पे हमारे ये भारी हैं
Read Moreईरान की बेटियों को निगल गया ये युद्ध,माताएं हुई बेऔलाद किस पे होए क्रूद्ध।प्यारी बिटिया! रोज स्कूल से लौटती थी,भविष्य
Read Moreज़रूरत के वक्त अक्सर अकेला पड़ता इंसान,भीड़ में रहते हुए भी ढूँढता है अपनी पहचान।जहाँ तक ताकत रहीं साथ बहुत
Read Moreइस ‘मोबाइल’ की छोटी स्क्रीन में,अब रिश्तों की दुनिया फिसल गई।यूं एक “हैप्पी होली” के मैसेज में,दिल की गर्मी कहीं
Read Moreना जाने ऐसी वह कौन-सी घड़ी थी,कैसे ‘मोहमाया में लिपटी’ खड़ी थी।आने की इज़ाज़त दे ‘मौन’ पड़ी थी,लापता आफ़त दरवाजे
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