लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 8)
प्रातःकाल होते ही वहाँ मुनि वशिष्ठ जी उपस्थित हो गये। उन्होंने शोकग्रस्त भरत जी को सांत्वना दी और कहा- “यशस्वी
Read Moreप्रातःकाल होते ही वहाँ मुनि वशिष्ठ जी उपस्थित हो गये। उन्होंने शोकग्रस्त भरत जी को सांत्वना दी और कहा- “यशस्वी
Read Moreअपनी बड़ी माता महारानी कौशल्या के पास जाने से पहले भरत जी कैकेयी को फिर फटकारने लगे- ”क्रूरहृदया दुष्टा कैकेयी!
Read Moreश्रीराम के वनगमन की बात सुनकर भरत जी स्तब्ध रह गये। उन्होंने सोचा कि अवश्य श्री राम से जाने-अनजाने में
Read Moreउस समय तक संध्या घिर आयी थी, अँधेरा होने को ही था। भरत जी जानते थे कि महाराज दशरथ इस
Read Moreभरत जी ने उसी समय अपने नाना जी के पास जाकर दूतों द्वारा लाया गया सन्देश सुनाया और अयोध्या से
Read Moreअवध से केकय तक का सारा मार्ग उन दूतों द्वारा देखा हुआ था। वे वहाँ पहले भी जा चुके थे।
Read Moreमहाराज दशरथ के शव को सुरक्षित कराने के बाद गुरु वशिष्ठ, मार्कडे, वामदेव, कश्यप, जाबालि आदि ऋषि, सभी मंत्री और
Read Moreमहामंत्री सुमन्त्र से श्री राम के चित्रकूट की ओर निकल जाने का समाचार पाकर महाराज दशरथ श्री राम के वियोग
Read Moreहमारे पौराणिक इतिहास में ‘भरत’ नाम के कम से कम चार महापुरुष हुए हैं- एक, ऋषभदेव या आदिनाथ के पुत्र
Read Moreकुछ दिन पहले मैंने एक लेख प्रस्तुत किया था- ‘आया बुढ़ापा, हाय जवानी’। इस लेख पर अनेक सज्जनों ने सकारात्मक
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