लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 17)
जब सभी आगन्तुक यथास्थान बैठ गये, तो ऋषि भरद्वाज ने श्री राम के प्रति स्नेह होने के कारण भरत जी
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Read Moreमेरे एक घनिष्ट फेसबुक मित्र ने यह पोस्ट आज ही लगायी है। वे अमरीका में रहते हैं, लेकिन उनके सम्बंधी
Read Moreनिषादराज गुह हाथ जोड़कर बोले- “राजकुमार भरत जी! आप रात्रि को यहाँ सुखपूर्वक रहे हैं न? आपको सेना सहित कोई
Read Moreशत्रुघ्न जी का विलाप सुनकर तीनों माताएँ वहाँ आ गयीं। वे पतिवियोग के दुःख और उपवास के कारण बहुत दुर्बल
Read Moreभरत जी श्री राम के बारे में निषादराज गुह से अधिक से अधिक जान लेना चाहते थे कि वे वहाँ
Read Moreजब सुमन्त्र जी को निषादराज गुह के आने की सूचना मिली, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उनको खेद भी
Read Moreभरत जी ने एक दिन पूर्व ही अपने कुशल कर्मचारियों को भेजकर मार्ग की बाधाओं (गड्ढों, झाडियों, पत्थरों आदि) को
Read Moreगुरु वशिष्ठ जी की बात का उत्तर देकर भरत जी ने सुमन्त्र जी से कहा- “सुमन्त्र जी! आप शीघ्र जाइए
Read Moreअयोध्या से शृंगवेरपुर तक का मार्ग सुधारने का आदेश पाते ही विशेषज्ञों और कुशल श्रमिकों का दल अपने साथ आवश्यक
Read Moreतेरहवें दिन के कार्य पूर्ण करने के बाद शोकसंतप्त राजकुमार भरत जी से उनके छोटे भाई शत्रुघ्न जी इस प्रकार
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