लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 15)
शत्रुघ्न जी का विलाप सुनकर तीनों माताएँ वहाँ आ गयीं। वे पतिवियोग के दुःख और उपवास के कारण बहुत दुर्बल
Read Moreशत्रुघ्न जी का विलाप सुनकर तीनों माताएँ वहाँ आ गयीं। वे पतिवियोग के दुःख और उपवास के कारण बहुत दुर्बल
Read Moreभरत जी श्री राम के बारे में निषादराज गुह से अधिक से अधिक जान लेना चाहते थे कि वे वहाँ
Read Moreजब सुमन्त्र जी को निषादराज गुह के आने की सूचना मिली, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उनको खेद भी
Read Moreभरत जी ने एक दिन पूर्व ही अपने कुशल कर्मचारियों को भेजकर मार्ग की बाधाओं (गड्ढों, झाडियों, पत्थरों आदि) को
Read Moreगुरु वशिष्ठ जी की बात का उत्तर देकर भरत जी ने सुमन्त्र जी से कहा- “सुमन्त्र जी! आप शीघ्र जाइए
Read Moreअयोध्या से शृंगवेरपुर तक का मार्ग सुधारने का आदेश पाते ही विशेषज्ञों और कुशल श्रमिकों का दल अपने साथ आवश्यक
Read Moreतेरहवें दिन के कार्य पूर्ण करने के बाद शोकसंतप्त राजकुमार भरत जी से उनके छोटे भाई शत्रुघ्न जी इस प्रकार
Read Moreप्रातःकाल होते ही वहाँ मुनि वशिष्ठ जी उपस्थित हो गये। उन्होंने शोकग्रस्त भरत जी को सांत्वना दी और कहा- “यशस्वी
Read Moreअपनी बड़ी माता महारानी कौशल्या के पास जाने से पहले भरत जी कैकेयी को फिर फटकारने लगे- ”क्रूरहृदया दुष्टा कैकेयी!
Read Moreश्रीराम के वनगमन की बात सुनकर भरत जी स्तब्ध रह गये। उन्होंने सोचा कि अवश्य श्री राम से जाने-अनजाने में
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