लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 29)
प्रातः उठकर सभी अपने नित्य कर्म करके चलने को तैयार हुए। पहले उन्होंने यमुना नदी पार की, जिसमें बहुत समय
Read Moreप्रातः उठकर सभी अपने नित्य कर्म करके चलने को तैयार हुए। पहले उन्होंने यमुना नदी पार की, जिसमें बहुत समय
Read Moreभरत जी द्वारा श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में चौदह वर्षों तक अयोध्या का शासन सँभालना स्वीकार करने के
Read Moreश्री राम की बात सुनकर भरत जी और अधिक उदास हो गये। अयोध्या से उनके साथ आये हुए सभी लोग
Read Moreट्यूशन से लौटकर आया हुआ रोहित घर में घुसते ही दादा जी से टकरा गया। दादा जी ने उसे रोककर
Read More“माँ जी ! आज त्यौहार है। घर में पकवान बने हैं। आप क्या खायेंगी- पूड़ी, कचौड़ी, पुलाव, खीर या कुछ
Read Moreऋषि जाबालि से बात करते हुए श्री राम कुछ रोष में आ गये थे, इसलिए महर्षि वशिष्ठ ने उनको शान्त
Read Moreभरत जी ने फिर कहा- ”भैया! आप अयोध्या लौटकर मेरी माता के कलंक को धो डालिये और पिताजी को भी
Read Moreअगले दिन प्रातःकाल सभी भाई और अन्य लोग अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के लिए मंदाकिनी नदी के तट
Read Moreउधर भरत जी का सन्देश पाकर गुरु वशिष्ठ जी के साथ आती हुई तीनों माताएँ श्री राम को देखने की
Read Moreअपनी कुटी के बाहर यज्ञ वेदी पर बैठे श्री राम की ओर देखते हुए भावविह्वल होकर भरत जी “भैया!” कहते
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