आत्मकथा : मुर्गे की तीसरी टांग (कड़ी 33)
सिर की मंडी में हमारी शाखा का नाम था ‘ध्रुव प्रभात’ और हमारे मुख्य शिक्षक थे श्री मुरलीधर जी ओझा।
Read Moreसिर की मंडी में हमारी शाखा का नाम था ‘ध्रुव प्रभात’ और हमारे मुख्य शिक्षक थे श्री मुरलीधर जी ओझा।
Read More15. रानी का कायरतापूर्वक समर्पण एक दिन नृत्य महफिल से उठकर सुल्तान अपने हरम में गया। और बांदी से रानी कमलावती
Read Moreअध्याय-10: सेवा धर्म कठिन जग माहीं काँटा लगे किसी को तड़पते हैं हम अमीर। सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर
Read More14. काफूर और हसन सर्वाधिक खूबसूरत युवतियों को सुल्तान ने अपने हरम में भिजवा दिया। बाकी को अमीरों और अफसरों में
Read Moreअपने स्कूल की राजनीति में तो मैं सक्रिय और प्रमुख भाग अदा करता ही था, विश्वविद्यालय स्तरीय राजनीति में भी
Read More13. राजसी लूट अल्लाह-हो-अकबर का नारा बुलंद करती मुस्लिम सेना तूफान की तरह महल में घुसी। सोलह वर्ष से अधिक आयु
Read Moreउस वर्ष 1981 में छात्र संघ के चुनावों में मैंने अपने स्कूल से श्री बी. राजेश्वर का पार्षद पद के लिए
Read More12. धर्म रक्षण हेतु पलायन ”महाराज आप राजकुमारी देवलदेवी को लेकर गुप्त मार्ग से निकलिए, समय बहुत कम है।“ कंचन सिंह
Read Moreजवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सतलुज छात्रावास में रहते हुए मेरे कई ऐसे मित्र बने जो मेरे सहपाठी नहीं थे। उनमें
Read More11. युद्ध की विभीषिका आन्हिलवाड़ की छोटी-सी सेना के अग्रिम में 200 घुड़सवार थे इसका संचालन सेनापति इंद्रसेन कर रहा था।
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