आत्मकथा : मुर्गे की तीसरी टांग (कड़ी 28)
वि.वि. में प्रारम्भ में मैं सबसे कटा-कटा रहा। सौभाग्य से वहाँ मेरे कमरे का साथी तथा कुछ पड़ोसी बहुत सहयोगशील
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Read More10. मिलन और बिछोह कोई आधी रात के समय सेनापति अपने शयन कक्ष में आया। पत्नी चंद्रावलि उसकी प्रतीक्षा कर रही
Read Moreशीघ्र ही वहाँ से टेस्ट तथा इन्टरव्यू का बुलावा आ गया। तारीख दो-चार दिन बाद की ही थी अतः हमने
Read Moreबालक तलवार लेने के लिए आगे बढ़ता है तभी कक्ष के द्वार पर आहट सुनकर दोनों द्वार की तरफ देखते हैं।
Read Moreअध्याय-9: अरावली का उत्तरी छोर मैं अकेले ही चला था जानिबे मंजिल मगर। हम सफर मिलते गये और कारवाँ बनता
Read More9. भविष्य का संकेत राजा की आज्ञा से महल में हलचल शुरू हो जाती है, सैनिक मुख्य प्रांगण में इकट्ठे हो
Read Moreमेरे अनेक अन्य पत्र मित्र भी रहे हैं। यदि उन सबका विस्तार से परिचय दूँ तो मेरी कलम को कभी
Read More8. स्वाधीनता की बलवेदी पर व्यग्र कर्ण देव टहलते हुए चिल्लाए, ”कोई है, कोई है?“ प्रहरी भाग के आया और अभिवादन
Read Moreशहनाज की तरह ही मेरी एक और पत्र मित्र थी- टीना। उसका असली नाम था ‘मैरीना कोलाको’। वह ईसाई थी
Read More7. आन्हिलवाड़ में नर संहार 1299 में बीस हजार घुड़सवारों सहित एक विशाल सेना लेकर नुसरत खाँ और उलूग खाँ राजधानी
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