भूषण छंद मुक्तक
जंगल, पर्वत करुण रुदन, ताल सरोवर अवरोधन। स्वार्थी मनु करता निज हित, धरती माता का दोहन।। पक्षी घुमते इधर-उधर, कहाँ
Read Moreजंगल, पर्वत करुण रुदन, ताल सरोवर अवरोधन। स्वार्थी मनु करता निज हित, धरती माता का दोहन।। पक्षी घुमते इधर-उधर, कहाँ
Read Moreजुग जुग जीना सैनिक तुम, भारत माता के प्रियतम। धीरज देता सदा सुफल, साहस का तुम हो उद्गम। समझे कडवे
Read Moreसंकट आया देश पर, सेना पर विश्वास। बलशाली चौकस खड़े, दुश्मन का संत्रास।। दुश्मन का संत्रास, भीति से थरथर काँपे।
Read Moreधर्म कर्म का हो चिंतन,अंतस निर्मल हो पावन। गंगा यमुना परम सुजल, पापों का कर परिमार्जन। भारत माँ का हो
Read Moreदुष्टों का खात्मा करो, जड़ से मिटे बुखार। ड़र के मारे काँपते, कायर वे मक्कार।। कायर वे मक्कार, मिटाये अब
Read Moreपुस्तक से हो मैत्री, हैं वह ज्ञान खजाना। साहित्यिक कृतियों का, अनुपम काव्य तराना। कला कुशलता पाएं, ज्ञानी शिल्प रचाएं।
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