ग़ज़ल
नर्म,चमकीले,घने,लंबे, उसके निराले गेसूवो संभाले भी तो किस तरह संभाले गेसू।तेरी ज़ुल्फ़ों को हटाऊँ तो हटाऊँ कैसे,मुझको आग़ोश में न
Read Moreवों बूढ़ी किताबें थम गईं, मन चंचल हो उड़ चला,शब्दों का सागर सूख गया , हर अक्षर जैसे मुड़ चला।
Read Moreयकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है,अंधियारे पथ में भी दीपक संभलता है। झंझाओं की गोद में काँपती लौ सही,पर
Read Moreरिश्तों में अब न पहले-सा वो एहसास है,हर शख़्स के लहजे में स्वार्थ का लिबास है। मिलते हैं मुस्कुरा के
Read Moreख़्वाब पलकों पे सजाएँ तो सँवर जाते हैंहम तो ख़ुशबू की तरह हद से गुज़र जाते हैं।यह जो मुँठी में
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