अनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी”
अनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी” सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे। वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।
Read Moreअनुष्टुप छंद “गुरु पंचश्लोकी” सद्गुरु-महिमा न्यारी, जग का भेद खोल दे। वाणी है इतनी प्यारी, कानों में रस घोल दे।।
Read Moreगुरु पूनम की वेला है, लगा यहां आज मेला है
Read Moreसवाई छंद/समान सवैया/32 मात्रिक छंद “वन्दना” इतनी ईश दया दिखला कर, सुप्रभात जीवन का ला दो। अंधकारमय जीवन रातें, दूर
Read Moreमुरलिया करत हिया में झंकार। अधर धरै जब कृष्ण कन्हैया बाजत दिल के तार। मुरलिया करत हिया में झंकार… खग
Read Moreजीवन पल पल यूं ही बीत रहा, आडंबर छोडिये। यदि जाना है भवपार, प्रभो से नाता जोडिये॥ मन मोह माया
Read Moreतम को करो आलोक मां, मन ज्ञान की ज्तोति करो। मां शारदे वाणी को अमृत, शब्दो को मोती करो॥ मन
Read Moreतुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ सिंह की सवार बनकर रंगों की फुहार बनकर पुष्पों की बहार बनकर सुहागन का
Read Moreमेरी प्रकाशित पुस्तक ‘श्री हरि-भजनामृत” से नवरात्रों के लिए मैय्या-भजन आई नवरातों की वेला मैय्या आ जाओ
Read Moreतुम नहीं आओगे हाँ ! तुम नहीं आओगे अभी इन्तजार लंबा है , निरंतर तुम खुद को ही झुठलाओगे हाँ
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