राजनीति

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पासपोर्ट भी नहीं तो फिर क्या? नागरिकता के उलझे तारों में फंसा आम आदमी

कानूनी रूप से यह स्थिति और भी पेचीदा है। 1955 का नागरिकता कानून स्पष्ट करता है कि नागरिकता जन्म, वंश,

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डिजिटल संप्रभुता की ओर निर्णायक कदम

वर्तमान युग को यदि डिजिटल युग कहा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने विश्व

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ब्रिटेन में बार-बार बदलते प्रधानमंत्री और भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफ़े की खबर ने एक बार फिर विश्व राजनीति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित

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हर शहर में सुलगती लापरवाही: क्या अगला लखनऊ आपका होगा?

जब कागजों की मंजूरियाँ और बंद लिफाफे सच को ढकने लगते हैं, तब आग केवल इमारतों तक सीमित नहीं रहती,

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लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर

लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूल अवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक

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