व्यंग्य : गरबे का जोश, शरीर बेहोश
पहले गरबा भक्ति का माध्यम था। लोग माता की आराधना कर कुछ कदम घूमते थे, प्रसाद खाकर घर लौट आते
Read Moreपहले गरबा भक्ति का माध्यम था। लोग माता की आराधना कर कुछ कदम घूमते थे, प्रसाद खाकर घर लौट आते
Read Moreजब सरकारी आदमी थे तब सर्कल में जेब में हाथ नहीं डालने वाले को चामठा,मट्ठा,चीठा, कंजूसड़ा,जैसे मारूं शब्द खूब चलते
Read Moreदशहरे का मौसम आते ही रावण की पूछ-परख बढ़ जाती है। साल भर समाज में रावण जैसी प्रवृत्तियाँ फलती-फूलती रहें,
Read Moreअक्सर कोहनी मारना यानि एक तरह से ठिठोली करना ही होता है। यारी दोस्ती में कोहनी मारना मजे लेने के
Read Moreअखबार की खबर पढ़कर मन में एक गंभीर सवाल उठता है-आखिर ये कैसे शातिर डकैत हैं, जो पेट्रोल पंप पर
Read Moreआज मुझे भी फीलिंग हो रही है। आप पूछेंगे- कैसी फीलिंग? किस बात की फीलिंग? बताऊँगा, बताऊँगा। जरा धैर्य रखिए।
Read Moreआप एक आम आदमी हैं,आम स्त्री हैं। इनमें न तो कोई नेता है, न उनका गुर्गा या चमचा है और
Read Moreमैं जहाँ रहता हूँ वहाँ और भी लोग रहते हैं। ये ऐसे लोग हैं जो गरीब तो नहीं हैं लेकिन
Read Moreपितृपक्ष का पहला दिन भी नहीं बीता था कि मित्र यमराज बिना किसी पूर्व सूचना के टपक पड़े। आते ही
Read Moreपहले आदत लगाइए, फिर कीमत चुकाइए। यह फार्मूला सदियों से चला आ रहा है। ड्रग माफिया भी कुछ ऐसा ही
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