कविता

कविता

मैं निरन्तर टूट टूटकर , फिर जुड़ने वाली वह चट्टान हूँ जो जितनी बार टूटती है जुड़ने से पहले उतनी ही बार अपने भीतर कुछ नया समेट लेती है में चाहती हूँ की तुम मुझे बार -बार तोड़ते रहो और में फिर जुड़ती रहूँ !!

स्वास्थ्य

तनावग्रस्त या चिंतित होना

यह एक आम शिकायत है। यह कोई शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि मानसिक बीमारी है, जिसका सीधा असर शरीर पर भी पड़ता है और लम्बे समय तक तनावग्रस्त रहने पर व्यक्ति शारीरिक रूप से भी बीमार हो जाता है। जब मनुष्य तनावग्रस्त हो जाता है तो उसका दिमाग केवल उसी के बारे में सोचता रहता […]

इतिहास

अनगिनित यादों के झरोखे में कलाम

शिक्षाविद , दार्शनिक , वैज्ञानिक , आध्यात्मिक , संगीतज्ञ , राजनीतिज्ञ , कवि – लेखक और चिंतक भारत रत्न महामहिम राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम को नमन ! मेरी उन्हें समर्पित कोटी कोटी श्रद्धांजलि …… अनगिनित यादों के झरोखे में कलाम ”बने धरती कैसे खुशहाल ” उस पल हुई सांसें बेहाल कह न पाई अपनी बात […]

गीतिका/ग़ज़ल

किसको दोस्त माने हम और किसको गैर कह दें हम

मिली दौलत ,मिली शोहरत,मिला है मान उसको क्यों मौका जानकर अपनी जो बात बदल जाता है . किसी का दर्द पाने की तमन्ना जब कभी उपजे जीने का नजरिया फिर उसका बदल जाता है .. चेहरे की हकीकत को समझ जाओ तो अच्छा है तन्हाई के आलम में ये अक्सर बदल जाता है … किसको […]

सामाजिक

70 फीसदी भारतीय नदियां प्रदूषित

यदि हमरे बस में होता, नदी उठाकर घर ले आते, अपने घर के रोज़ सामने, उसको हम रोज़ बहाते.  -प्रभुदयाल श्रीवास्तव ‘कंधे पर नदी’ कविता लिखते हुए प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने कभी यह नही सोचा होगा कि भारत में एक दौर ऐसा भी आएगा जब यही नदियां विश्व कि सबसे प्रदूषित नदियों में से एक हो जाएँगी. भारत  में सभी सहायक नदियों को मिलकर कुल 51 नदियां है. जिसमे से हिमालय से निकलने वाली ‘सिंधु, गंगा, और ब्रह्मपुत्र’  प्रमुख है। प्राचीन समय से सभी नदियां भारतवासियो के जीने का हिसा रही है। लेकिन 20वी शताब्दी में आते ही नदियों ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया। वर्ल्ड रेसोर्सेट के मुताबिक 70 फीसदी भारतीय गन्दा पानी पीते है जिनसे पीलिया, हैजा, टायफाइड, और मलेरिया जैसे अनेक खतरनाक बीमारिया पैदा हो रही है। इतना ही नही ‘द एनर्जी एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट’ अथार्थ ‘टेरी’ के एनवायर्नमेंटल सर्वे 2015 में कहा गया कि दिल्ली में 92 फीसदी लोगो ने माना है कि यमुना के पानी की गुडणवत्ता ख़राब है। दिल्ली के वो 8 फीसदी लोग कौन है जिनका मानना है, कि यमुना का पानी पिने योग्य है, इसपर रिसर्च करके बड़ी बहस हो सकती है। लेकिन उससे पहले यह जानना जरुरी है, कि नदियों का पानी ख़राब होने कि वजह क्या है? क्यों नदियों ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया है? जीवन देनी वाली नदियां अब क्यों जान लेने पर तुली है? अगर यह बात किसी भी आम आदमी से पूछी जाये तो उसका यही कहना होगा कि औद्योगिक कचरे कि वजह से नदियां प्रदूषित हो रही है। परन्तु सर्वे कुछ और ही बयां करते है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक मात्र 30 फीसदी प्रदूषण कि वजह औद्योगिक कचरा, कृषि अपशिष्ट और कूड़ा इत्यादि है। यानि कि औद्योगिक कचरे कि मात्र 30 फीसदी से भी कम। वाही 70 फीसदी प्रदूषण कि वजह अशोधित गंदगी और मल-मूत्र है। अकड़े से साफ जाहिर होता है कि नदियों को कम्पनिया कम और मनुष्य ज्यादा गन्दा कर रहा है। लेकिन लगातार औद्योगिक कचरे का इजाफा बढ़ता जा रहा है है, जो एक परेशानी की बात है। भारत जैसे जैसे विकास कि तरफ बढ़ता जा रहा है, तरक्की कि तरफ भागता जा रहा है, तो दूसरी तरफ बहुत बड़ी गलती भी कर रहा है। आज देश कि 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हो चुकी है और खतरनाक बीमारियो को जन्म दे रही है। इसके बचाव में पिछले 25  वर्षो में विभिन्न सरकारी एजेंसियों ने नदियों को साफ करने में 8  अरब से ज्यादा रूपये खर्च किये है, परन्तु गंदगी का प्रतिशत घटने कि बजाए बढ़ता जा रहा है और रुकने का नाम ही नही ले रहा। दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में अब गंगा भी हो चली है। मोदी सरकार हो या फिर कोई और सभी ने पैसा को पानी की तरह पानी में बहा दिया। पिछले साल तय किया गया कि इस्राएल कि मदद से 2020 तक गंगा को साफ कर दिया जायेगा। लेकिन खुद इस्राएल के विशेषज्ञों का मानना है, कि गंगा को साफ करने के लिए काम से काम 20 वर्ष लग जायेंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने स्वच्छ भारत अभियान में गॉव, कसबे, शहर, कि गलियो को, सड़को को, नलियो को, मैदानों को, साफ रखने कि बात कही, अगर नदियों को भी इसी में जोड़ दिया जाता तो इसका असर इतना होता कि जो प्रतिशत बढ़ता जा रहा है वो कम तो होता ही। आज गंगा, यमुना, सिंधु, या कोई और नदी, सभी पर सरकार को पैसा बर्बाद करने कि बजाय चिंतन करना चाहिए और गंदगी फैलाने कि सही वजह ढूंढकर उस पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो आने वाले कुछ वर्षो में यह पता लगाना नामुमकिन हो जायेगा कि सबसे प्रदूषित नदी कौन सी है, क्योकि सब का रंग एक जैसा होगा. 0 फीसदी ऑक्सीजन के साथ, ‘काला’। मनोज सिंह

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रोज सपनो मे पलती है रोज हाथों से फिसलती है जिन्दगी ना जाने तु किस गति से चलती है कभी भरती है झोलियां खुशियों से कभी दगाबाज सी छलती है जिन्दगी ना जाने तु किस गति से चलती है…… बिठाती है कभी अर्श पर कभी जमीं भी फिसलती है जिन्दगी ना जाने तु किस गति […]