गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मौसम की अंगड़ाई समझ, यह बदली क्यों छाई समझ। आंखें तेरी रोशन हैं, फिर क्यों ठोकर खाई समझ लिखने से पहले अपने, लफ़्ज़ों की गहराई समझ दिल में जब तूफान उठे, याद किसी की आई समझ आज नमिता खुश है तू, दिल में मस्ती छाई समझ — नमिता राकेश

कविता

नट

वो हम जैसा दिखता है पर हम जैसा है नहीं हम चलते हैं ज़मीन पर और बात करते हैं आसमान की वो चलता है रस्सी पर और बात करता है सिर्फ पेट की दिखाता है करतब अजब अनोखे अनूठे और एक पहिये की साइकिल रस्सी पर चलाते हुए अपने आस पास जुट आई भीड़ से […]

कविता

वर्षगाँठ

जब मैं पहली बार मिली तुमसे तो लगा जैसे अब हुई है मेरे जीवन की सही शुरुआत मानो मेरे जीवन के कैलेण्डर में जनवरी आ गया और ,धीरे धीरे एक एक मुलाकात में एक एक कर कई महीने ऐसे बीत गए कि पता ही नहीं चला कि कब तुम्हारे प्यार की चमकीली धुप लिए जून […]

कविता

नए रास्ते

जब आसमान सो जाता है और पृथ्वी भी हो जाती है ख़ामोश दिल के सभी दरवाज़े हो जाते हैं बंद रास्ते हो जाते हैं सुनसान मंज़िलें खो जाती हैं कोहरे में रात हो जाती है और भी स्याह तो कहीं दूर बहुत दूर सुनाई देती है आहट सुबह की रोशनी की दिखने लगते हैं नए […]

राजनीति

कतार से परहेज़ क्यों?

अगर है परेशानी तो है। क्या इससे पहले हमने कभी परेशानी नहीं झेली ? क्या इससे पहले हम कभी कतारों में नहीं लगे ? भूल गए वो राशन की कतारें , मंदिरों में दर्शन के लिए घंटों खड़े रहना ? शराब की दुकानों में कतार में खड़े होकर ज़हर खरीदना मंज़ूर है ? किसी बड़े […]

कविता

कविता : हे कृष्ण ! कहाँ छिपे हो

हे कृष्ण ! कहाँ छिपे हो क्यों नहीं आते क्यों नहीं लेते अवतार क्या तुम भी घबराने लगे हो इन कलयुगी वाशिन्दों से या फिर सुविधा शुल्क का रसपान तुम्हें भी करवा दिया गया है या फिर इन्तज़ार कर रहे हो रात के और काली हो जाने का हे कृष्ण! क्यों खामोश हो अबलाओं का […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

देख मेरी नजर गर मचल जाएगी ख़ामशी शोर में दिल की ढल जाएगी चढ़ते सूरज की पहली किरण देखना रात की सारी स्याही निगल जाएगी धूप चाहत की खिलने तो दे हमनशीं बर्फ़ अहसास की भी पिघल जाएगी हर तरफ सब्ज़ खलियान होंगे तभी जब नदी फ़ाइलों से निकल जाएगी आज ‘नमिता’ मसीहा मिरा आ […]

संस्मरण

मेरे पापा

आज पापा नहीं हैं ।जब थे तब हैप्पी फादर्स डे कहने का चलन नहीं था लेकिन मेरे पापा खुश रहते थे ।मैने उन्हे कितना खुश रखा यह मै नही जानती मगर इतना जानती हूँ कि उन्होने मेरी हर खुशी का ध्यान रखा । शायद मम्मी से भी ज़्यादा । मै बहुत लाडली थी और इसी […]

कविता

तुम्हारी आंखें

जब भी पलकें बन्द करती हूँ आंखों के भीतर तुम्हारी आंखें दिखाई पड़ती हैं तुम्हारी आंखें सारी दुनिया भुला कर सिर्फ मुझे देखती आंखें तुम्हारी आंखों से छलकता सारा प्यार मेरे अन्दर तक समा जाता है और भाव अतिरेक में जज़बात उमड़ने लगते हैं दिल की धड़कनों पर काबू करती हूँ तो लगता है जैसे […]

हाइकु/सेदोका

चंद हाइकु

जब तक  हम अपनी सहन शक्ति का प्रदर्शन करते रहेंगे तब तक  मेरे ये हाइकु ज़िंदा रहेंगे — 1 भारत वासी शान्ति के पुजारी हैं रहेंगे चुप       2 ज़ुल्म सहना हमारी आदत है ढाते रहो जी    3 आतंकी बाज़ कर गए शिकार कबूतर का     4 हाथ मिलाया दोस्ती का जब […]