Category : विविध





  • व्यंग्य – झाड़ू की व्यथा

    व्यंग्य – झाड़ू की व्यथा

    हिन्दी दिवस पर एक प्रचलित कहावत दिमाग में उँगली कर रही है- घूरे के दिन फिरना, यानि “अच्छे दिन आना।” देखिए ना आजकल ‘उस’ मुहावरे का अर्थ भी ‘यह’ मुहावरा बन गया है। इसी को कहते...


  • मुस्कुराने का कोई मोल नहीं

    मुस्कुराने का कोई मोल नहीं

    यह तो आप भी जानते हैं, कि मुस्कुराने का कोई मोल नहीं लगता. हमारा भी कहना-मानना है- मुस्कुराओ कि मुस्कुराने पर कोई मोल नहीं लगता, गुनगुनाओ कि गुनगुनाने का कोई टोल नहीं लगता हंसने-हंसाने को ही...

  • दीपक मेहता की समाजसेवा

    दीपक मेहता की समाजसेवा

    अगस्त के अंतिम दिनों और सितम्बर के आरम्भिक समय समाजसेवी दीपक मेहता ने मदमहेश्वर और कल्पेश्वर धाम की यात्रा की; यात्रा से लौटते ही वे पुनः समाजसेवा में लग गए। शीत ऋतु के निकट आने पर...


  • सुखी परिवार

    सुखी परिवार

    वाराणसी की मूल निवासी नीतू शुरू से ही दोनों पैरों से विकलांग है. इस कारण परिवार में उसको उचित प्यार नहीं मिला. ‘विकलांग बल’ संगठन के सदस्यों चन्द्र मोहन सजवाण, सारिका भाटिया और विनीत के प्रयासों...