कविता

आग



आग लगी है, आग लगेगी, आग लगाने आये हैं
कायरता की मोटी बेड़ी आज जलाने आये हैं
हृदयों में भड़के अंगारे तूफानों से टकराने को
रणचंडी की अपने लहू से प्यास बुझाने आये हैं

नयी जवानी नया खून और नया जोश उबलता है
देख देख धरती की हालत ह्रदय हमारा जलता है
नैराश्य भरा है जिनके मन उनको पुनः जगाने आये हैं
आग लगी है, आग लगेगी, आग लगाने आये हैं

fire in heart
सोया भाग्य जगाने फिर से हम चट्टानों से टक्कर लेंगे
आगे नित ही नित बढ़ने को तूफानों को टक्कर देंगे
गिरी हारकर है जो जवानी उसे उठाने आये हैं
आग लगी है, आग लगेगी, आग लगाने आये हैं!!

____सौरभ कुमार दुबे

सौरभ कुमार दुबे

सह सम्पादक- जय विजय!!! मैं, स्वयं का परिचय कैसे दूँ? संसार में स्वयं को जान लेना ही जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है, किन्तु भौतिक जगत में मुझे सौरभ कुमार दुबे के नाम से जाना जाता है, कवितायें लिखता हूँ, बचपन की खट्टी मीठी यादों के साथ शब्दों का सफ़र शुरू हुआ जो अबतक निरंतर जारी है, भावना के आँचल में संवेदना की ठंडी हवाओं के बीच शब्दों के पंखों को समेटे से कविता के घोसले में रहना मेरे लिए स्वार्गिक आनंद है, जय विजय पत्रिका वह घरौंदा है जिसने मुझ जैसे चूजे को एक आयाम दिया, लोगों से जुड़ने का, जीवन को और गहराई से समझने का, न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पहलु पर अपार कोष है जय विजय पत्रिका! मैं एल एल बी का छात्र हूँ, वक्ता हूँ, वाद विवाद प्रतियोगिताओं में स्वयम को परख चुका हूँ, राजनीति विज्ञान की भी पढाई कर रहा हूँ, इसके अतिरिक्त योग पर शोध कर एक "सरल योग दिनचर्या" ई बुक का विमोचन करवा चुका हूँ, साथ ही साथ मेरा ई बुक कविता संग्रह "कांपते अक्षर" भी वर्ष २०१३ में आ चुका है! इसके अतिरिक्त एक शून्य हूँ, शून्य के ही ध्यान में लगा हुआ, रमा हुआ और जीवन के अनुभवों को शब्दों में समेटने का साहस करता मैं... सौरभ कुमार!

3 thoughts on “आग

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत अच्छी कविता .

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत प्रेरक कविता

  • प्रदीप कुमार तिवारी

    Saurabh bhai kya bat kahi hai

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