कविता

माना जख्म गहरा है….

माना जख्म गहरा है
अभी तक हरा है
तुम एक बार लगाकर तो देखो
प्यार के मरहम ने, हर जख्म भरा है।

अल्लाह तुम भी नही
भगवान मैं भी नही
गुनाह तुम्हारा भी है
गुनाह मेरा भी
पर इस नफरत से
दोनों को कुछ नही मिलेगा
तबाह घर तेरा भी है
तबाह घर मेरा भी।

बहाने को
इंसानियत का खून
ना गीता कहती है
ना कुरान कहती है
फिर धर्म के नाम पर
सिर्फ कट्टरता क्यूं रहती है।

अभी भी वक्त है
चलो
अपने गुनाह कूबूल कर लें
अपने अपने धर्म को
कट्टरता के शैतान से, दूर कर लें
प्यार के मरहम को
दिलों पर लग जाने दें।
भर जाने दें, इन घावों को
मानवता को मुस्काने दें।

माना जख्म गहरा है
अभी तक हरा है
तुम एक बार लगाकर तो देखो
प्यार के मरहम ने, हर जख्म भरा है….

सतीश बंसल

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.