संस्मरण

मेरी कहानी 94

पार्क लेन डिपो में आ कर मैं बहुत खुश था और एक बात से और भी ख़ुशी थी कि आइरीन जैसी मेट मुझ को मिल गई थी। अछे साथी का होना भी किस्मत की बात ही होती है। पहले हैरी बीवर ड्राइवर होता था तो मैं उस के साथ कंडक्टर होता था, अब मैं ड्राइवर था तो आइरीन मेरी कंडक्ट्रेस थी। यूं तो हम दूर दूर के रूटों पर काम करने जाते रहते थे लेकिन हमारा पक्का रुट था underhill एरिये से warstone एरिये को जाना। यह सारा एक चक्कर एक घंटे में पूरा हो जाता था लेकिन हमें हर एक चक्कर के बाद बीस मिनट मस्ती करने के लिए मिल जाते थे। इस वक्त में आइरीन के मुंह से पहली बात जो निकलती थी, mr. bhamra cup of tea ? मैं बोलता yes आइरीन। वोह कैफे में जाती और दो कप चाय के ले कर मैस्स रूम में आ जाती। यह मैस्स रूम ड्राइवरों कंडक्टरों और इंस्पैक्टरों से भरा रहता था जिसको स्टैफोर्ड स्ट्रीट ऑफिस बोलते थे। आइरीन के इस कप ऑफ टी ने मुझे भी टीहौलिक बना दिया था। दस बारह कप चाय के रोज़ाना पी जाता था और पीता भी बहुत गर्म गर्म था। एक आदत थी आइरीन की फ्रूट खाने की। अंडरहिल से पहले स्कॉटलैंड आइलैंड के नज़दीक एक शॉपिंग सेंटर के नज़दीक हम बस खड़ी कर लेते और आइरीन एक फ्रूट शॉप में घुस जाती और कभी पीच कभी ऐपल और कभी कोई और फ्रूट ले आती। आधे मुझे दे देती और आधे खुद रख लेती। काम करते करते हम खाते रहते। पैसे हम बाद में हिसाब कर लेते। आइरीन अब इस दुनिआ में नहीं है लेकिन उन की यादें कभी कभी आ जाती हैं।

मेरी कहानी के एपिसोड 92 में मैंने इनोक पावल की स्पीच rivers of blood के बारे में लिखा था जिस की वजह से racial tension हमारे शहर में बहुत बढ़ गई थी लेकिन इसी दौरान 1969 में ही एक और धमाका हुआ। बहुत पहले मैंने यह भी लिखा था कि इंग्लैण्ड में पगड़ी के साथ काम करने की बहुत फैक्ट्रियों में इजाजत नहीं थी। शायद ही कोई फैक्ट्री मालिक होगा जो पगड़ी की इजाजत देता था। बसों में तो कम्पनी की ओर से ड्रैस कोड बने हुए थे कि हर एक को स्मार्ट यूनिफार्म के साथ हैट पहननी जरूरी होगी। हमारे साथ एक लड़का काम करता था, जिस का नाम था तरसेम सिंह संधू। वोह तीन हफ्ते काम पर नहीं आया। जब आया तो उस ने दाहड़ी रखी हुई थी और सर पे पगड़ी भी रखी हुई थी। बुकिंग क्लर्क ने उसी वकत मैनेजर बटलर को टेलीफून कर दिया। बटलर एक बहुत ही सख्त आदमी था। वोह उसी वक्त आ गया और तरसेम सिंह को कहा कि वोह शेव करके आये वरना उस को काम से जवाब हो जाएगा। तरसेम वापस चले गया और पहले टाऊन के साम के अखबार express & star के ऑफिस में गया और एक बयान दिया कि वोह एक सिख है और उस के धर्म में सर पे पगड़ी रखना लाज़मी है। वोह पगड़ी बाँध कर काम करना चाहता है लेकिन इस बात से उस को मना किया जा रहा है।

फिर तरसेम एक सिख लीडर c . s . panchhi को मिला जिसने जा कर टाऊन के ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट के साथ मीटिंग की, लेकिन उन्होंने यह बात उसी वक्त ठुकरा दी। पंछी ने इस बात को यहीं खत्म नहीं किया बल्कि उस ने ट्रांसपोर्ट जैनरल वर्कर्ज यूनियन (T G W U ) से संपर्क किया . यूनियन ने पगड़ी के हक्क में मोशन पेश कर दिया और वोह ट्रांसपोर्ट कमेटी से मिले लेकिन ट्रांसपोर्ट कमेटी ने उन की बात को भी ठुकरा दिया। वोह कहने लगे कि उन का स्ट्रिक्ट ड्रैस कोड है, इस को ना मानने वाले को काम पर रखा नहीं जाएगा। अब तक हर टाऊन में गुरदुआरे बन चुक्के थे। गुरदुआरे के सिख लीडरों और लोकल इंडियन वर्करज़ एसोसिएशन ने इस मुहिम को तेज कर दिया और बात अब सिख धर्म से सम्बंदित पगड़ी की शुरू हो गई।

आज इंगलैंड में इतने शानदार गुरदुआरे बन गए हैं कि सिख हर जगह बेख़ौफ़ हो कर अपने त्योहार मना रहे हैं और सड़कों पर जलूस निकाल रहे हैं जिन में पांच पियारे हाथों में किरपान लिए जा रहे होते हैं, यहां तक कि बहुत सी सिख लड़किआं भी अमृत छक कर बेधड़क हो कर किरपान पहने रखती हैं लेकिन इस सब के पीछे बहुत बड़ी जदोजहद रही है और लोग इस बात को भूल चुक्के हैं। इस जदोजहद में हमारे लोगों को बहुत दुःख सहने पड़े थे, तब हमारी ही ट्रांसपोर्ट की गैरेज से मुहिम शुरू हुई थी तो इसके हक्क में हमारे ही बहुत लोग सहमत भी नहीं थे क्योंकि सभी डरते थे कि इनोक पावल की स्पीच से हालात तो पहले ही बिगड़े हुए थे, इस पगड़ी के सवाल से तो और भी बिगड़ जायेंगे। जब सी एस पंछी और TGWU भी जोर लगा कर थक गए और ट्रांसपोर्ट कमेटी ने पगड़ी बाँधने की इजाजत नहीं दी थी तो वुल्वरहैम्पटन में ट्रांसपोर्ट कमेटी के खिलाफ मुजाहरे करने का फैसला लिया गिया। बात अब पार्लिमेंट के मेंबरों तक पौहंचाई गई।

उस वक्त के अकाली पार्टी के प्रेज़िडेंट सोहन सिंह जौली ने 6000 सिखों का शांतमई जलूस निकालने का संकल्प ले लिया और यह भी ऐलान कर दिया कि वोह लोगों के सामने अपने आप को आग लगा कर मर जाएगा क्योंकि इंगलैंड में सिखों को धार्मिक आज़ादी नहीं दी गई थी। उस ने यह दिन मुकर्रर किया, वैसाखी वाला दिन 13 अप्रैल 1969 . इंग्लैण्ड के मिडिया में तरथल्ली मच गई। मीडीआ लोगों के विउ ले रहा था कि वोह इस पगड़ी के सवाल पर किया सोचते थे। ज़्यादा अँगरेज़ यह ही कहते थे कि उनको कोई फरक नहीं पड़ता था, अगर वोह सही काम कर रहे हों तो। वुल्वरहैम्पटन के मेयर ने कहा की यह ब्लैक मेल है। उस समय के इंगलैंड में इंडियन हाई कमिश्नर शांती सरूप ने डिपार्टमेंट औफ ट्रांसपोर्ट से मुलाकात की कि सोहन सिंह जौली की मौत का इंगलैंड और इंडिया के संबंधों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। इंडिया से आये दिली गुरदुआरा प्रबंधक कमेटी के जत्थेदार सरदार संतोख सिंह ने इंग्लैण्ड में आकर जगह जगह स्पीचें दीं और कहा कि इससे अंग्रेज़ों के इंडिया में इंट्रेस्ट पर प्रभाव पड़ेगा। इस मुहिम के खिलाफ भी हमारे कुछ लोग थे जैसे dr. A K S AUJHLA जो सुप्रीम काउंसल ऑफ सिख्स यूके से ताउलक रखते थे, उस का कहना था कि हमारे खिलाफ नफरत की आग तो पहले ही भड़क चुक्की थी, इस ऐक्शन से और भी ज़्यादा खराब होगी।

इधर यह बातें हो रही थीं तो उधर स्किनहैडों ने बहुत परेशान कर रखा था और बस्स वालों पर अटैक कर रहे थे। एक दिन तो हमारे लड़के भी हाकिआं ले कर कुइन स्ट्रीट में आ गए जिसमें ईवनिंग पेपर एक्सप्रेस ऐंड स्टार की प्रैस थी। दुसरी तरफ स्किनहेड आ गए और बीच में बहुत सी पुलिस कुत्तों को साथ लिए खड़ी थी। कभी बसों वाले आगे होते कभी स्किन हैड और एक्सप्रेस ऐंड स्टार वाले हमारे लड़कों की फोटो ले रहे थे। हमारे कुछ लड़कों को पुलिस पकड़ कर ले गई और चार्ज कर लिया क्योंकि उन के हाथों में हाकिआं थीं और इस को वे उफैंसिव वैपन बता रहे थे। दूसरे दिन अखबार में फ्रंट पेज पर हाकिआं पकडे हुए हमारे लड़कों की फोटो थीं। पुलिस और प्रैस हमारे खिलाफ थे। बस के सभी मेम्बरों ने पैसे इकठे किये और अपना वकील कर लिया और मुक़दमे में सभी लड़के निर्दोष सिद्ध हुए।

13 अप्रैल जिस दिन सोहन सिंह जौली ने 6000 लोगों का मुजाहरा करना था और अपने आप को आग के हवाले करना था, नज़दीक आ रहा था, जिस की वजह से सिआसत गरमा गई थी। 8 अप्रैल को अचानक लंदन से मिनिस्टर ऑफ एम्प्लॉयमेंट mr. earnest fernyhouse वुल्वरहैम्पटन आ गिया और वुल्वरहैम्पटन ट्रांसपोर्ट कमेटी से बात की कि इस बात से देश के विकास पर बुरा असर पड़ेगा। दूसरे दिन 9 अप्रैल को फिर दो घंटे बात चली और पगड़ी की इजाजत देने का फैसला ले लिया गिया। यह सिखों की बहुत बड़ी जीत थी। इस के बाद ही सोहन सिंह जौली ने प्रैज़ीडैंसी से अस्तीफा दे दिया कि वोह अब दूसरे शहरों में सिखों के हक्कों के लिए लड़ेगा। इस जीत का इतनी जल्दी असर नहीं हुआ क्योंकि अभी भी हमारे सिख भाई डरते शर्माते और संकोच करते थे क्योंकि गोरे अक्सर हमें टर्बन हैड कह कर बुलाते थे। एक एरिये में urban district का बड़ा सा बोर्ड लगा हुआ था। किसी गोरे ने शरारत से अर्बन के पहले T लिख दिया था जिस से यह टर्बन डिस्ट्रिक्ट दिखाई देता था।

कुछ सालों बाद एक गुरबक्स सिंह नाम का सिख पगड़ी और लम्बी दाहड़ी के साथ काम पर रख लिया गिया। गुरबक्स सिंह तकरीबन चालीस साल का एक गुरसिख था और बहुत ही शरीफ और पड़ा लिखा था। उस की पत्नी मेरी पत्नी कुलवंत के साथ ड्रैस मेकिंग फैक्ट्री में काम करती थी। गुरबक्स सिंह को देख कर कुछ और लड़कों ने भी पगड़ीआं रख लीं। अब पगड़ी नॉर्मल होने लगी थी और मैनेजमेंट की तरफ से हर एक को दो दो पगड़ीआं मिलने लगीं थी। कुछ सालों बाद मैंने भी पगड़ीआं ले ली थीं और शर्म संकोच खत्म हो गिया था। तरसेम सिंह संधु तो केस जीतने के कुछ महीनों बाद ही काम छोड़ कर किसी और शहर की ट्रांसपोर्ट कंपनी में लग गिया था लेकिन जाने से पहले एक ऐसा काम कर गिया था जो इतहास ही बन गिया। सच्च ही है कि रास्ते बनाने वालों को कठिनाईआं पेश आती हैं लेकिन दूसरों के लिए सफर आसान हो जाता है. छै महीने हुए उस की एक इंटरवीऊ टीवी पर सुनी थी, अब तो तरसेम भी हमारी तरह बूढ़ा हो गिया है लेकिन वोह वोही वुल्वरहैम्पटन की बातें कर रहा था। मैं उस को बहुत धियान से सुन रहा था और लग रहा था जैसे यह कल की बातें ही हों।

मेरी कंडक्ट्रेस आइरीन रस्सल एक आयिरश औरत थी और वोह हमेशा कहती रहती थी कि यह अँगरेज़ अच्छे नहीं हैं, सिखों को पगड़ी की इजाजत देनी ही चाहिए थी। फिर वोह आयरलैंड के बारे में बोलती कि इन अंग्रेज़ों ने आयरलैंड को बहुत खराब किया हुआ था और यह अँगरेज़ आयिरश लोगों को नफरत करते थे इसी लिए तो उन की आई आर ए संघठन इन लोगों के खिलाफ लड़ती थी। 9 अप्रैल को यह सब खत्म हुआ तो कुछ चैन हुआ था । कुछ हफ्ते बाद ही 18 मई को हमारी बिटिआ रीटा नें जनम लिया था। यह दिन बहुत बुरे थे। हमारे लोगों की संखिया तो दिन-ब-दिन बढ़ रही थी लेकिन साथ ही नफरत भी बढ़ रही थी। मुझे याद नहीं किसी टाऊन में गोरों ने एक सिख लड़के को मार दिया था और कुछ गोरों ने कहा था “one down, a million go” यानी एक को मारा तो मिलियन यहां से भाग जाएंगे।

गोरे लोगों के हम पर हमले कभी खत्म नहीं हुए, यह अभी तक जारी हैं लेकिन अब हमारे यहां के पैदा हुए बच्चे भी गोरों से कम नहीं हैं. बिदेस में किया किया तकलीफें आती हैं, जब हम अपने देश में आ कर बताते हैं, तो लोग सुनना ही नहीं चाहते। वोह तो ऐसे खुआब देखते हैं कि उन्हें इंगलैंड एक स्वर्ग ही दिखाई देता है, यही वजह है कि आमिर घरों के लड़के लड़किआं बाहर आने को तरस रहे हैं जैसे मैंने एक दफा बताया था कि एक थानेदार हमारे साथ भारा गंदा काम कर रहा था। हमारी औरतें जो गाँवों में मेहतर औरतों से पशुओं की जगह साफ़ करवाया करती थी, आज खुद एयरपोर्टों पर टॉयलेट साफ़ कर रही हैं और फखर से कहती हैं, ” बहन जी मैं एअरपोर्ट पे काम करती हूँ “. फखर भी क्यों ना करें, पाउंड जो मिलते हैं।

चलता. . . . . . . . . . . . .

4 thoughts on “मेरी कहानी 94

  • विजय कुमार सिंघल

    भाई साहब, आपकी यह क़िस्त भी अच्छी लगी. पगड़ी बांधने की स्वतंत्रता के लिए आपने जो संघर्ष किया वह प्रशंसा के योग्य है.
    लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आती. गुरु गोविन्द सिंह ने सिखों के लिए 5 चिह्नों पर जोर दिया था- केश, कच्छा, कड़ा, कंघा और कटार. आजकल सिख बंधुओं का जोर केवल केशों पर होता है. कड़ा तो वे हाथों में पहन लेते हैं, कंघा भी बालों में छिपा लेते हैं, पर कच्छा और कटार को भूल जाते हैं. उनको केश रखने के साथ-साथ कच्छा भी पहनना चाहिए और कटार भी रखनी चाहिए. तभी सिख वेश पूरा होगा. कृपया इस बारे में अपने विचार दें.

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      विजय भाई , बात तो आप की सही है लेकिन इन को मैं समय की कम्ज़ोरीआन ही कहूँगा . अब तो ब्राह्मण भी चोंटी नहीं रखते जनेऊ नहीं पहनते ,लड़कियन स्करतें पहने लगी हैं और शराब भी पिने लगी हैं . मेरा खियाल है धर्म की परिभाषा पहले जैसे रही नहीं . मैं किया जवाब दूं किओंकि मैं खुद पूर्ण सिंह नहीं . यहाँ के बच्चे गुरदुआरे जा कर खुश नहीं ,सिर्फ ख़ास अवसर पर ही जाते हैं . इस का जवाब मैं इस लिए नहीं दे सकता कि मैं खुद वोह नहीं बना .होना तो ऐसा ही चाहिए जैसा आप ने लिखा है . इंगलैंड में इसाई मत का बहुत जोर होता था ,इन का पुराना इतहास पड़ा जाए तो जब अँगरेज़ इतने पड़े लिखे नहीं होते थे तो यह हाथ में पत्थर की बाइबल ले कर जाते थे .जब हम यहाँ आये थे तो हर टाऊन में इतने चर्च होते थे कि रवीवार को चर्च के घंटे बजते थे .अब बहुत से चर्च तो हमारे लोगों ने ले कर गुरदुआरे मंदिर बना लिए और बहुत से यों ही बंद हो गए .गोरा कोई चर्च जाता देखा ही नहीं ,पहले हर रवीवार को चर्च जाया करते थे . यही असर हम पर भी हुआ है .कुछ लोग पूरण सिंह हैं लेकिन बहुत कम .इस का कोई ख़ास जवाब मैं दे नहीं सकूँगा किओंकि मेरे बच्चों ने पगड़ी नहीं रखी .

  • मनमोहन कुमार आर्य

    नमस्ते आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। पूरी क़िस्त पढ़ी। आपकी कन्डक्टरेस्स के बारे में बढ़ा। यह पढ़ कर दुःख हुवा कि वह अब संसार में नहीं है। पगड़ी के लिए संघर्ष किये जाने का वर्णन भी पढ़ा। एक समय था कि देश में सभी पुरुष पगड़ी बांधते थे और यह प्रतिष्ठा की निशानी होती थी। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। अब धीरे धीरे लोग अपनी धार्मिक अच्छी परम्पराओं को भी छोड़ रहे हैं। आज हिन्दुओं की युवा पीढ़ी का तेजी से पाश्चात्यीकरण हो रहा है। शायद यह समय की मांग है और धार्मिक लोगो की कुछ कमजोरिओं का परिणाम है। क़िस्त ब हुत अच्छी लगी। हार्दिक धन्यवाद। सादर।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      मनमोहन भाई , धन्यवाद .मुझे लगता है ,मुगलों के आने से पहले सभी लोग इंडिया में पगड़ी बांधते थे ,जैसे राजिस्थान में बहुत लोग बांधते हैं . इंगलैंड में पगड़ी का मसला कुछ इस लिए भी था कि अंग्रेजों को इंडिया से आये अभी ज़िआदा समय नहीं हुआ था और यह अभी भी भारतीओं को गुलाम ही समझते थे ,किओंकि बहुत गोरे तो ऐसे थे जो इंडिया काम करते आये थे और उन्होंने जो सलूक भारतीओं के साथ किया था ,अभी भी उन के ज़हन में था लेकिन अब ज़माना बदल रहा है .जो गोरे कभी भारतीओं को नफरत करते थे अब भारतीओं की फैक्ट्रीओं में काम कर रहे हैं .

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