गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

भावना भी धवल रही होगी |
साधना तब ये फल रही होगी |
कार्य कारण पता नहीं मुझको
जिन्दगी आप छल रही होगी |
कर्म रत हो मिली तुझे मंजिल
रब दुआ कुछ फजल रही होगी |
दुख सभी का समझ रहे अपना
फिर वो दुनिया सरल रही होगी |
खुद खड़े तप रहे शजर जैसे
उनकी’ नीयत तरल रही होगी |
पाहनों में दबा सुखी जीवन
आसुरी सी पहल रही होगी |

“छाया”

छाया शुक्ला

छाया शुक्ला "छाया" प्रकाशित पुस्तक "छाया का उज़ास"

2 thoughts on “गीतिका

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी ग़ज़ल !

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी ग़ज़ल !

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