कहानी

कहानी – मायावी पुरुष

वह हर रोज़ तब अपनी कुटिया की ओर चल पड़ता जब सूर्य की किरणें अपने सफर की मंजिल को पूरा करके धरा से टकराकर व परिवर्तित होकर फिर से नई मंजिल का ख़्वाब सजा चुकी होतीं, जब हवा रात के अँधेरे में भटकने के बाद रोशनी में अपनी भूल चुकी अस्तित्व की गंध को महसूस कर चुकी होती, जब चीड़ के पेड़ांे की रात की निद्रापूर्ण सुस्ती सूर्य की किरणों की तपस से अपनी भूख मिटाने के लिए व्याकुल हो चुकी होती। दूसरी ओर से भी कुछ इंसान उसकी कुटिया की ओर चल पड़ते, ऐसे इंसान जो वर्षांे से पक रही किसी ख़्वाइश को हकीकत में बदलने के चाहवान हैं जिन्हें ईश्वरीय सत्ता के चमत्कारों में विश्वास व ऐसी आस्था है कि उन इंसानों के शरीर रूपी पिंजरे में प्रकाश से भी हज़ारों गुणा तेज़ चलने वाला मन उनके कदमों को कुटिया की ओर चल पड़ने का हौसला देता। वे अपनी इच्छा के तीव्र वेग के वशीभूत होकर हर पगडण्डी को लाँघते हुए उस दिव्य कुटिया में पहले से पहुँच चुके मायावी पुरुष से अपनी इच्छाओं के मधुर मिलन के लिए बेकरार दौड़ पड़ते।
जब नकारात्मकता का बादल किसी निराश मन में फैलने का प्रयास कर रहा होता या फिर कोई मंजिल को चलने से पहले ऐसे हवा के सघन प्रवाह से परिपूर्ण झोंके का इंतज़ार कर रहा होता जो उसे पीठ पीछे से धकेलना शुरू कर दे तब वे लोग भी उस ओर चल पड़ते, जहाँ पहुँचने पर उनके द्वारा किसी चीज़ को प्राप्त करने के घटनाक्रम से गढ़ा हुआ महत्वाकांक्षा का मायाजाल दिव्य पुरुष के मिलन के बाद पर्त दर पर्त खुल जाएगा और उस दिव्य पुरुष का ईश्वर की प्रदत शक्ति के प्रभाव से वह मायाजाल हकीकत की तहों से निकलकर इच्छाओं के पूर्ण होने का चमत्कार करेगा। उसकी प्रसिद्धि दूर – दूर तक फैलने लगी है जब कोई उसके बारे में किसी से चर्चा करता तो सुनने वाला अपनी वर्षों पहले त्याग चुकी कल्पनामयी इच्छाओं की शक्ति को दुर्बल हो चुके शरीर में पुनः खोजता और उसका अनुयायी बनने का स्वप्न पलों में सजा लेता। उसके मरुस्थल बन चुके मन रूपी रेत के समुद्र में एक नखलिस्तान उभरने लगता। वह उस दिव्य पुरुष के बारे में बिस्तार से चर्चा सुनना शुरू कर देता। कोई नया सुनने वाला जैसे ही दिव्य पुरुष के बारे में सोचने लगता तो उसके मन में विचित्र व आनंददायी अनिवार्य विचार आने लग पड़ते। उसे उदास आँखों में असंख्य सितारे ज़मीन की ओर दौड़ते नज़र आते, उसे धरा आकाश की ओर खिसकती नज़र आती।
वह दिव्य पुरुष ऐसे पहनावे में आता कि कोई राह चलता यह सपने में भी नहीं सोच सकता कि वह साधारण सा दिखने वाला पुरुष सपनों को हकीकत में बदनले के चाहवान लोगों की नगरी को बसाने अपनी कुटिया में जा रहा है। वह समय के अनुसार अपने कपड़े बदलता। गर्मियों में वह टी शर्ट व जींस भी डालता, वह बालों को काला करने वाली स्याही भी अधपके बालों पर पोतता। वह रोज़ शेव करता और स्पोर्ट शूज डाल कर अपना ट्रैकिंग बैग पीठ पर टाँगता और उस जगह की ओर निकल जाता जहाँ दिन के वक्त जब चीड़ के पेड़ांे के बीच से पश्चिम की ओर या कभी दोपहर में सिर के ऊपर की सूर्य की रश्मियाँ पेड़ों से टकराकर परावर्तित होकर इधर – उधर फैलती और कुछ रश्मियाँ उसके शरीर के ऊपर पड़तीं तो एक आभामंडल का निर्माण होता। कई भक्तों को वह दिव्य आत्मा नज़र आता, कइयों को वह ईश्वर के दिव्य आशीर्वाद का वाहक लगता। वह जब वर्तमान में होते हुए जब किसी भक्त के सामने अपनी आँखें इसलिए बंद करता ताकि किसी व्याकुल भक्त के भूत व वर्तमान जीवन के नैपथ्य में जाकर उसके मन की गहरी कंदराओं में छिपी भौतिक व मानसिक इच्छाओं से साक्षात्कार कर सके।
उसका मौन ध्यान में जाकर ईश्वर की सत्ता के अमूल्य व विशाल भंडार से कुछ धन, यश या फिर तृप्ति का सामान उस भक्त को बाँट सके जो उसके सामने हाथ जोड़े बैठा है। वह हर भक्त के जीवन या कार्यक्षेत्र से उपजी हर समस्या के निवारण की फरियाद अपने निशब्द मौन के रथ में बिठाकर ईश्वर के मौन कर्णों तक शोर बनाकर पहुँचा दे जैसी ही कोई फरियाद ईश्वर के महीन व कमजोर स्मरण शक्ति युक्त कानों तक पहँुच जाती तो वह अपनी आँखें खोलता और थोड़ी सी चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर निशब्द रहकर यह एलान कर देता कि बस अब भक्त तेरा कल्याण हो गया। तुम शांति व सुकून के साथ धूणे से मुट्ठी भर भभूति ले जाकर अपनी इच्छा को फलीभूत होने का चमत्कार महसूस करो। उसकी आँखें तब तक बंद रहती जब तक वह अपने शरीर के अंदर स्थित हृदय की विशाल गुफा मंे अद्वितीय अज से परिपूर्ण ईश्वर को शाश्वत रूप में देखकर भक्त की इच्छा के परिपूर्ण होने का वरदान पाकर नहीं लौट आता और उसे भक्त के हवाले करके ही वह आँखें खोलता। जब भक्तों को संतुलित जीवन की चाह में असंतुलित इच्छों के बोझ को वह जब कुछ कम कर देता तो बदले में वह उन भक्तों से सिर्फ यही चाह रखता कि वे उस आधुनिक से दिखने वाले योगी के जीवन को भी संतुलित करने में कुछ मदद करें। पर वह शाब्दिक कुछ नहीं माँगता, बस मौन ही उसके लिए जीवन यापन का सामान इकट्ठा करने के लिए शब्द बनने का प्रपंच करता।
उसका चेहरा हमेशा आनंदित रहता, वह छोटे – छोटे यांत्रिक कार्य भी करता। वह जब अकेला होता तो अपनी कुटिया के इर्द – गिर्द कच्ची व उपजाऊ मिट्टी में भक्त लोगों के मनों से बिखरी कुछ इच्छाओं के बीजों को कच्ची मिट्टी में रोपता जाता ताकि वे भक्त फिर से उसके पास आएँ जब उन बीज़ांे से निकले छोटे पेड़ों में अपने अधिकार क्षेत्र को फैलाने का जुनून पैदा हो जाएगा। तब वे प्रकाश, पानी और हवा में घुली गैस को छानकर अपने लिए भोजन की व्यवस्था करने का प्रण कर लंेगे, जब उनकी पतली जडंे़ धरा के अंदर की खोहों में छिपे पानी को ढूँढने की चाहत के संग दूर तक निकलकर पानी को प्राप्त कर एक जश्न पैदा कर लेंगी। वे फिर से किसी मोह के जाल से पकड़ी इच्छा के फलीभूत होने से ज्वर ग्रस्त हो जाएँगे, यह फिर उनकी कोई पारिवारिक समस्या उनके संतुलित जीवन के तराजू के दो सिरों को असंतुलित कर रही हो। वह दिव्य पुरुष किसी भक्त के दुख दर्द को ऐसे सुनता जैसे मंदिर में बैठा ईश्वर साक्षात मूर्त रूप से शाश्वत हो चुका है। वह एक सच्चे दोस्त की तरह बनकर भक्तों के जख्मों के लिए असंख्य जड़ी बूटियों को इकट्ठा करके एक चमत्कारी मलहम तैयार करता वो धीरे – धीरे अपने दिव्य हाथों की ऊँगलियों से उन्हें मलहम लगाता। भक्त ऐसा महसूस करते जैसे उनके दुख – दर्द की पीढ़ा को दिव्य मलहम पल में अवशोषित कर क्षितिज की ओर वाष्पित कर रहा हो।
वह जब एकांत में बैठा होता तो अपने ऊपर मंडराती हवा से कुछ बातें करता-‘‘हर जगह विचरण करती हो तुम, नित नए आकाश के नीचे, घाटियों, पहाड़ों, मैदानों की सैर करती हो, बड़ी चंचल हो तुम, क्या-क्या देखती हो तुम जीवन दायिनी, जरा मुझ भी बताओ, ईश्वरीय सत्ता के प्रमाण सुंदर दृश्यों का हाल सुनाओ, मैं तो यहाँ अपनी कुटिया के इर्द – गिर्द चीड़ के नुकीले पत्तों को समेटने में ही लगा रहता हूँ और उन सुखों की तलाश में भटक कर यहाँ तक पहुँचे राहगीरों का इंतज़ार करता हूँ। मेरा तो वक्त अब उनके लिए सुखों को पाने की व्यवस्था करने के लिए सीमित हो गया है। उन्होंने मुझे भी बाँध दिया है एक जगह। अब तुम ही कुछ सुनाओ, बता दो तो तेरे व मेरे एक ईश्वर ने जो इतना विचित्र संसार बनाया है उसका कुछ हाल सुना दो। तुम तो सारे भेद जानती हो। सभी सुखों – दुखों की पहरेदार हो। जोखिम भरी कई यात्राएँ करती हो, किसी विपाशा की तरह कभी रुकती नहीं हो, न कोई एक ठिकाना है तुम्हारा न कोई घोसला, कभी शिखर को चूमती हो तो कभी धरातल पर पल भर में पहुँच जाती हो, गहरी कंदराओं में विचरती है, नन्हें श्वास के लिए तड़फते कीट पतंगो के लिए जीवन बाँटती हो। बस मृत शरीरों से वफा नहीं कर पाती हो। तुम्हें न कोई सागर मिटा सकता है और न कोई रेत का विशाल क्षितिज, तुम्हारा ठिकाना तो नए ग्रहों पर भी होगा, ज़रा कुछ पल आराम करके मुझे अपनी मायावी इच्छाओं का हाल तो सुनाओ।’’
जीवन दायिनी हवा नई दुल्हन सी यहाँ-वहाँ अपनी पतली कमर मटकाती विचरती रही, मुस्कुराती रही, अपने सुनहरी कंगन खनकाती रही, अपनी मोहक अदाओं से उसके इर्द – गिर्द घूमती रही।
जब हवा से बातें करके उसका मन भर जाता तो वह चीड़ के पेड़ों की अस्तित्वहीन होकर गिरी नुकीली पत्तियों को चुगता हुआ बातें करता-‘‘क्या तुम सभी ने अपना कर्मशील जीवन में वह आनंद प्राप्त कर लिया है, क्या तुम फिर से किसी पेड़ के लिए दिव्य भोजन बनाने की इच्छा से फिर लौटोगी, गर नहीं तो मैं तुम्हारे लिए एक इच्छा का निर्माण करने में सहायता कर सकता हूँ, आना फिर से मैं इंतज़ार करुँगा तुम्हारा, अभी मैं तुम्हें धूने के लिए अग्नि के आगाज़ के लिए इकट्ठा कर रहा हूँ, तुम कुछ धुएँ के साथ इस कुटिया के ऊपर फैले आकाश की ओर निकल जाओगी, पर तुम अगले वर्ष फाल्गुन के महीने में आने की कोशिश करना, वैसे तुम जिद्दी पेड़ की पत्तियाँ हो, तुम किसी और ही मौसम के बहकावे पर चलती हो पर तुम्हारा और मेरा ईश्वर तो एक ही है।
जब इस प्रकृति के सबसे प्रचंड देवता सूर्य के आभामंडल से गिरती कुछ रश्मियाँ चीड़ के पेड़ों से होते हुए अपनी पुरानी पगडंडी से निकलकर रोशनी की धाराएँ उसके सामने फेंकना शुरू कर देतीं तो वह उनसे बातंे करने लगता-‘‘तुम अनंत प्राणियों के जीवन में चुपचाप प्रवेश करके उनके लिए विचित्र संरचनाओं का निर्माण करती हो, पर बदले में कुछ भी नहीं चाहती हो।’’
उसके पास दो तरह के ही लोग आते हैं। वे जो बड़े – बडे़ सुख की इच्छा से एच्छिक भम्रित है और दूसरे वे जो छोटे- छोटे सुख की कामना में पूरा जीवन समर्पित करने का माद्या रखते हैं, उनके शरीरों में महत्वाकांक्षाओं का ज्वार तो उठता है जहाँ लहरें उठती और आगे बढ़ने का साहस तो करती पर अपने शरीर के अंदर ही एक ऐसा किनारा भी बनाते, कि उस किनारे से टकराकर लहरें मिट जाएँ।जब लोग उसके सामने बैठते तो उन्हें लगता कि उम्मीद की खिड़की उस वक्त पूरी खुल जाएगी जब वह तपस्वी अपनी दो छोटी -छोटी आँखें खोलेगा और उन दिव्य चक्षुओं से होते हुए ऐसी रोशनी प्रकट होगी जो सुखों के विशाल शिखर को अपने तेजस्वी व मजबूत कंधों पर उठाकर लाएगी।
जब कोई औरत भक्त उसके सामने बैठती, तो वह नए चेहरे की आँखों के दो सागरों के अंदर छिपी गहरी कंदराओं में दुबकी उसकी इच्छाओं को अपने दिव्य प्रकाश से ढूँढ लेता, फिर वह अपने दिव्य हाथों से सहारा देकर उसे सागर की सतह पर ले आता और कहता, ‘‘आओ चलो! किसी शिखर की ऊँचाई को नापने चलते हैं, वहाँ से क्षितिज के उस पार का नज़ारा देखंेगे।’’
वह फिर उस भक्त की इच्छा को बहलाता हुआ और अपने दिव्य शब्दों से शक्ति बाँट कर भविष्य से कुछ चुरा लाने का ठोस और तत्कालिन जोखिम सीखने का मंत्र याद करवाता। वे सब लोग ऐसे होते जैसे उन्होंने अपने वर्तमान को दाँव पर लगाकर भविष्य की तस्वीर में सैंकड़ांे रंग भरने की कल्पनामयी दुनिया सजाई हो। वे नई – नई तमन्नाएँ अपनी शुष्क मन की घाटी में अंकुरित करने का सामर्थ रखते हो। वे ऐसे लोग होते जो अपनी कल्पनाओं में सजाए छोटे – छोटे ख़्याली महलों को बड़ी तीर्वता से इस दिव्य पुरुष के आशीर्वाद से पाना चाहते हो। वे प्रतीक्षा को बहुत पहले अपने घर के किसी अँधेरे कोने में छोड़ आए होते।
वह वर्षों से अपनी कुटिया पर आ रहा है अभी तक उसने न जाने कितनी ख़्वाइशों को हकीकत की चादर ओढ़ा कर गहन निद्रा में सुला दिया है। फिर भी अब तक उसे आराम नहीं मिला है, हर वर्ष जब पतझड़ के बाद बसन्त में पेड़ों से नए पत्ते इस ब्रह्मांड की सत्ता का दृश्य देखने के लिए सूर्य की गर्मी को अवशोषित करने की कला सीख लेते, तब इंसानों के शरीरों के अंदर सबसे अधिक क्रियाशील इंद्रियों के राजा मन में भी कई साम्राज्यों के निर्माण की लालसा पनपने लगती।
वह दूर से ईश्वर को पुकारता और कहता ‘‘अब फिर से मुझे नए अँकुरों को सींचने का कार्य सौंप दिया है तुमने, मुझे कभी तो चैन से बैठने दिया करो।’’
पर फिर दूसरे ही पल उसके अंदर की एक तृष्णा उसे क्रियाशील कर देती। यही भक्तों का जमावड़ा उसकी रोज़ी रोटी का सामान अपने थैलों में भरकर लाएँगे, तो फिर चैन कहाँ, वह आधुनिक होते कलयुग के इंसानों में कुछ मनोवैज्ञानिक रूप से हताश या फिर आस्था को अपनी मुठ्ठी में लेकर चलने वालों की वजह से ही तो अपनी रोज़ी रोटी का प्रबंध कर पा रहा है तो फिर ईश्वर की सृष्टि की माया ही सही है। वह और बाबाओं या चमत्कारों से परिपूर्ण लोगों की तरह प्रवचन नहीं करता। उसका बड़ा साधारण सा नियम है। वह हर पाखंड से दूर है, वह अंधविश्वास से भी कोसों दूर है और न किसी भक्त में अंधविश्वास की मद्धम लौ जगाने का साहस करता है। वह एक प्रेरणात्मक गुरु की छवि में अपने आभामण्डल का निर्माण कर रहा है, पर इस सब के बावजूद वह एक मायावी इच्छाओं के परिपूर्ण होने के दिव्य स्वपन को अपनी ईश्वर भक्ति से उपजे ज्ञान के प्रकाश से प्राप्त करने में लगा है।
खुली आँखों से जब वह सामने बैठे भक्त के चेहरे को देखता तो जैसे भक्तों के चेहरों पर सुंदर गुलाब के फूल खिल उठते हों। एक भीनी रोशनी किसी दैविक अग्नि की तरह उनकी आँखों में जलने लग पड़ती हो । उनके ख़्वाबों की परतों में एक परत परी लोक की जलपरियों के रहस्यमयी किस्सों से भर पड़ती हो, जो बाबा की मायावी दुनिया के किसी चित्रकार के रहस्यमयी परिकल्पना से उपजे रंगों के जादुई संसार से बनी है। उनके मन के किसी अँधेरे कोने से हजारों पक्षियों से भरे पिंजरे के द्वार खुल जाते ओर असंख्य पक्षी इधर – उधर बिखर कर इस नीले रहस्यमयी आकाश के तले अपने घोंसले सजाने की सरंचनाओं के निर्माण का निर्णय करते। उनकी आँखों में एक अतृप्त प्यास उस मायावी पुरुष के आभामंडल में तैरती मीठे पानी की झीलों व झरनों से जल को अवशोषित करने लग पड़ती। भक्त उसके प्रखर आत्मविश्वास व स्वतंत्र भक्ति में डूबे अस्तित्व के गुलाम बनकर फिर पलांे में खुद का एक स्वतंत्र अस्तित्व वरदान में पाकर दूर क्षितिज की ओर निकल जाते।
एक दिन ईश्वर से रूठे एक नास्तिक भक्त ने दस्तक दी, ‘‘बाबा मुझे बस इतना बता दो कि क्या आप सचमुच ही ईश्वर के प्रकाश से रश्मियों को लाकर भक्तों की खाली झोलियों मंे डाल देते हो? मुझे विश्वास नहीं हो रहा , पर एक बात का अनुभव कहता है कि यहाँ आने पर यशस्वी किरणों के सिर पर मंडराने का सुंदर अहसास होता है, मन में सुंदर ध्वनियों का अहसास होता है, मुझे अलभ्य खजाने के पास होने का अहसास होता है, मेरे मन में तीव्र इच्छाओं का वेग दौड़ने लगता हैं ये सब कैसे संभव हो रहा है।’’
बाबा उसकी बातों पर मंद-मंद मुस्कुराए और बोले, ‘‘बात तो बहुत छोटी सी है पर इसे समझने में पूरा जीवन लग जाता है, ईश्वर एक अनुभूती है, इसे मौन से ध्यान से पाने से अच्छा है कि आप प्रकृति में इर्द – गिर्द फैले ईश्वर के स्वरूप को समझ कर आनंद का अहसास करें। ज़्यादा कोशिश भी ठीक नहीं। हवा, पानी, धरा, आसमान में ईश्वरीय कणों का समावेश है, सच का रखवाला ईश्वर है, चाहे तो उसे मूर्त बनाकर अपने मन में धारण कर लो या फिर जैसा वह नैपथ्य में बैठा सारी प्रकृति को दिशा निर्देश देता है उसे उस रूप में अपना लो। ईश्वर के लिए तड़फने से बेहतर है उसके मृदु उच्चारण की भाषा को समझा जाए। जब धूप से तपती धरा पर छाँव की शीतलता प्राप्त हो जाए, जब वर्षा गमन की प्रतीक्षा से तपिसश के दिन कटते जाएँ, जब कष्ट की राह से आनंद की पगडंडी निकल आए, जब कष्टों के थोड़े कटने के बाद राहत की शीतलता की ध्वनी कानों में गूँजने लगे, तभी ईश्वर की अनुभूति होने लगती है। भूख का अहसास भी ईश्वरीय प्रमाण हो जाता है। ईश्वर को देखने, सुनने के लिए मायावी आँखों या कानों की ज़रूरत नहीं होती। वे साधारण आँखों से भी दिख जाते हैं, वह रहस्य भी है और एक सुलझी पहेली भी। हमने अपने जीवन का ध्येय अपनी यांत्रिक शक्ति से वस्तुएँ इकट्ठी करने में लगा दिया है तो फिर हमें ईश्वर की रचनात्मकता का ध्यान ही कहाँ है। ये दुनिया करोड़ों रहस्यों से भरी है, हर रहस्य में ईश्वरीय अनुभूति के सुराग हैं, बस ढँूढने की इच्छा मिल जाए।’’
बाबा फिर आँखें बंद करके किसी रोशनी की अँगुली पकड़ कर दूर निकल गया था। एक दिन एक कमज़ोर आवाज़ सुनकर उसने अपनी आँखें खोली। एक नौजवान भक्त ने कुटिया में दस्तक दी। ‘‘मैं कई लोगों से आपकी रहस्मयशक्ति के बारे में सुन चुका हूँ कृप्या मुझे जीने की शक्ति बाँटो, मैं कई बाबाओं और मंदिरों की चौखट में माथा रगड़ चुका हूँ। कृप्या मेरा कल्याण करो! हे मायावी धर्मात्मा!’’ विनीत नौजवान बोला।
नौजवान भक्त ने खुद को एक रहस्यमयी दुनिया में पाया। वह अपनी उत्कंठा के वशीभूत अपनी हर इच्छा को परत दर परत खोलता गया। जब वह अपनी सारी समस्याएँ बता कर मन का बोझ हल्का कर बैठा तो मायावी पुरूप ने अपनी आँखे बंद कर ली।
उसने देखा कि वह नौजवान व्यक्ति ख़्वाइशों के मनकों की माला को दिन रात फेरते रहता है, पर इसके अलावा वह कुछ नहीं करता। उसका मन निर्मल प्रवाह इच्छाओं के नखलिस्तान में ईंट मसाले से बने एक विश्राम गृह में रहता है। वहाँ नाड़ियों में रक्त को शुष्क कर देने वाले मरूस्थल के सफ़र से जब कई काफ़िले आते, तो वह उन्हें दूर से देखता, पर कभी उनके साथ किसी नई मंजिल की यात्रा पर निकलने का साहस नहीं करता। वह इतना चाहता है कि वही नखलिस्तान मंें कुछ खजूरों के पेड़़ों के मीठे खजूर खाने के अलावा वह फिर से ठंडे गृह में घुस जाता था। कई काफ़िलों को वह अभी तक गुजरता देखता रहा है। वह निश्चित फल के लिए उसके सामने बैठा है।
मायावी पुरुष ने अपनी आँखें खोल दी । बाबा की आँखें किसी बूढे़ सम्राट की आँखों की तरह नौजवान को झाँकने लगीं जो अपनी प्रजा के दुखों के प्रति परवाह तो थीं पर वह सम्राट इतना शक्तिमान नहीं था तो अपने भक्त के लिए कुछ संकल्प या चुनौती बाँट सके। बाबा ने फिर आँखें मूंद ली पर वह उस भक्त के लिए ईश्वर के देदीप्यमान स्थान से संभावनाओं का प्रकाश व शक्ति नहीं ले पाया। मायावी पुरुष ने अपना मुख खोला, ‘‘तुम्हारा कल्याण हो, अपनी मूल प्रवृति की खोज में निकलो वत्स, तुम ठहर गए हो, प्रकाश कहीं दूर घाटियों की ओर निकल गया है। फिर से कुटिया में आना, ईश्वर तुम्हारे लिए एक नई पगडंडी ढूँढने में व्यस्त है।’’
भक्त ने धूने से मुट्ठी भर राख लेकर अपने थैले में डाली और वह आगे निकल गया। वह कई दिनों के बाद कुटिया में लौटा।अब वह किसी हलचल को महसूस करके आया था। वह अब पहले से कई गुणा अधिक पेरशान था। अब उसके पास निर्मल इच्छाओं का प्रवाह नहीं बलिक अनिश्च्यतत्ता का फल प्राप्त करने की कोई इच्छा थी।
उस भक्त को देखते ही मायावी पुरुष की दो छोटी आँखों में दो सितारे आकाश से उतरे। उसने फिर से आँखों को बंद करके सितारों को आकाश को लौटा दिया और भक्त के मन के अँधेरों में कुछ ढूँढा। बाबा ने देखा कि वह असहाय नौजवान व्यक्ति अपने मन में नकरात्मकता के बादलों के नीचे अपनी झोंपड़ी बनाकर रह रहा है। बाबा ने उन बादलों में एक सुराख किया और वहाँ से तेज रोशनी का प्रभेदकारी वेग उसकी झोंपड़ी की ओर बढ़ने लगा। बाबा ने फिर आँखें खोली ,‘‘तुम ईश्वरीय प्रसाद के हकदार बन गए हो भक्त, जाओ तुम्हारे लिए आंनद की राह बन रही है पर तुम्हें यह याद रखना होगा कि पहले तुम्हारा कष्ट के सामान्य चौराहे से सामना करना होगा। फिर तुम लंबी यात्रा पर निकल जाओगे। तुमने निशिचंतता के पिंजरे को तोड़ दिया है, अब ये आकाश तुम्हारा है और कई पगडंडियाँ हवा में तैर रही हैं, तुम कोई भी रास्ता अपना लो। हर रास्ता तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक ले जाएगा। जाओ! भक्त धूने से कुछ भभूति ले जाकर अपने घर में छिड़को, रोशनी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। वह इस वक्त तुम्हारे घर के द्वार पर पहुँच चुकी है।’’
भक्त के लिए ये शब्द किसी चमत्कार से कम नहीं थे। वह मन में अपनी इच्छा के पूर्ण होने का दिव्य प्रसाद प्राप्त कर चुका था। कुछ ही दिनों में उस भक्त ने वही प्राप्त किया जो उसने नकारात्मकता के बादलों के छँटने के बाद अपनी मन रूपी ज़मीन में बोया था।
कुछ दिनों के बाद ज्येष्ठ की एक दुपहरी में एक अधेड़ आदमी व एक युवती ने कुटिया में प्रवेश किया। सूर्य के लौटते प्रकाश में युवती ने देखा कि इस मायावी पुरुष की वेशभूषा सादगीपूर्ण और सुरूचिपूर्ण थी और वह इस युवती को एक साधारण पुरुषसा लगा। उस मायावी पुरुष की उम्र भी अधिक नहीं थी। वे छोटी सी चटाई को खींचकर मायावी बाबा के सामने बैठ गए। युवती को अधेड़ आदमी ने कुटिया के बगीचे को देखने को कहा और बाबा से कोई गुप्त मंत्रणा की बात कही। युवती कुछ दूर निकल गई। मायावी इंसान कुछ क्षण तक अधेड़़ आदमी के चेहरे की ओर एकटक गौर से देखता हुआ बोला, ‘‘ईश्वर की शक्ति और जिस कला की मैं उपसाना करता हँू उसकी शक्ति से अपने भक्तों को हर मुकाम पर ले जा चुका हूँ और उनके लिए कई कल्याणपूर्ण मार्ग बना चुका हूँ ।उसी कला से मैं तुम्हारी आत्मा के बोझ को हल्का कर सकूँगा, ईश्वर अपनी रोशनियों को बाँटने को तैयार बैठा है।’’
अधेड़ आदमी ने मायावी पुरुष के और नज़दीक जाकर क्षीण आवाज़ में कहा, ‘‘यह जो लड़की है, यह मेरी बेटी है पर सच सिर्फ मैं जानता हूँ, यह नहीं। यह मेरे एक जानकार व्यक्ति की महिला मित्र की बेटी है। इसका जन्म तब हुआ था जब वह उसके प्यार के अथाह सागर में डूबा था। इसके बाप ने इसकी माँ को धोखा दिया और इन दोनों को छोड़कर कहीं भाग गया। आपकोे यह जानना ज़रूरी है कि उसके भागने या धोखा देने के पीछे कौन हो सकता है, अगर आप ईश्वर प्रदत्त शक्ति की उपासना में डूबे रहने वाले एक बाबा रूपी इंसान हो। तो मेरे लिए कोई समाधान व जरूरी मार्ग ढूँढोगे।’’
‘‘पहले उसे धोखा देने के पीछे कौन था? यह बताओ, मेरी उत्सुकता बड़ चुकी है।’’बाबा ने कहा।
‘‘क्या आप इस बात के राज़ को किसी को बताएँगे तो नहीं।’’ अधेड़ ने कहा।
‘‘मैं कसम खाता हूँ, किसी को भी नहीं।’’ बाबा ने कहा।
वह व्यक्ति फुसफुसाया, ‘‘वह पापी मैं ही था, क्योंकि मैं भी उस वक्त लोगों की समस्याओं का हल ढूँढने के जुनून में एक बाबा बना हुआ था और धोखा देने की सलाह उस व्यक्ति को मैंने ही दी थी, वह उस वक्त मेरी भक्ति मे अंधा था। वह दिन मेरी आँखों के सामने है जब वह व्यक्ति मुझ से पहली बार मिला था। उसको आखिरी धोखा देने की सलाह मैंने कई महीनों के बाद तब दी थी, जब वह अपनी मौहब्बत के शरीर में एक बीज डाल चुका था। मुझे सिर्फ दुख इस बात का है कि मैंने तब कई भक्तों की ख़्वाइशों को मामूली बातें समझा और उन्हें अपने मन में आई एक छोटी सी सलाह को पत्थर की लकीर बनाकर पेश किया। मैं पापी हूँ पर मैंने उस पाप का प्रायश्चित भी किया। जब उस औरत को समाज ने कई तरह की ठोकरों का आशीर्वाद दिया तब उसके पीछे मेरी ही वह सलाह थी। मैं भी आपकी तरह जंगल में कुटिया बनाकर भक्तों का इंतजार करता था। कुछ दिनों के बाद एक दिन जब वह गर्भवती लड़की अपनी माँ संग मेरी कुटिया में आई तो मेरी आत्मा के ऊपर हज़ारों टन बोझ पड़ गया। मैं उन माँ – बेटी को पहचान गया, अरे। मैंने एक पाप कर दिया है, मेरे बाबा रूपी शक्ति के तार झनझना उठे और उनकी सैंकड़ांे प्रतिध्वनियाँ मेरे कानों में गूँजने लगी। मेरा मन फूट – फूट कर रो उठा। ईश्वर की शक्ति किसी के हाथ में नही आ सकती, मुझे उस दिन अहसास हो गया।
‘‘मैंने उस माँ और उसकी भोली बेटी की मासूम आँखों को एक टक देखा और सिर्फ इतना कहा कि शायद ईश्वर प्रदत्त शक्ति के द्वारा तो नहीं पर जिस शक्ति की उर्जा को मैं आज समझा हूँ उसी शक्ति से मैं तुम्हारे मन को शांत, सुरक्षा व सहानुभूति की राह दिखाऊँगा। मैंने कुछ ही दिनों के बाद उन दोनों को फिर से अपनी कुटिया में बुलाया। लेकिन मेरे मन ने अब परत दर परत अपने कई पुराने कर्मकांडों की गुप्त मंत्रणा कर डाली, मैंने ईश्वर की शक्तियों का प्रपंच रचा। उसकी उपासना के मूलभाव में ज्ञान का प्रकाश नहीं ढूंढा और अपने आप को रहस्यमयी बनाने के लिए कई लोगों की इच्छाओं के साथ खेलता रहा। ईश्वर ने मुझे एक बार फिर से जगा दिया और मैंने उस अवसर को बर्बाद न होने दिया। मैंने संदेह, चिंता और भूतकाल को पीछे धकेल दिया। मुझे अब बस उस गर्भवती लड़की और उसकी माँ का इंतज़ार था। मैंने ईश्वर से प्रार्थना की और इस बार जैसा मैंने सोचा, वैसा ही होने की उम्मीद में जीना शुरू कर दिया।
‘‘एक बार फिर माँ और बेटी उदास मन में कोई उम्मीद लिए मेरे सामने बैठी थी। मैंने उन दोनों की आँखों में उस वक्त ईश्वरीय शक्ति की उम्मीद के हज़ारों सितारे देखे। मैंने अपने मन को पक्का करते हुए फिर एक झूठ जो ईश्वर ने मुझे बोलने का आदेश दिया था । मैंने कहा कि मैंने ईश्वर से प्रार्थना की और उसने मुझे यह आदेश दिया कि मैं उसकी कृपा को आगेे बढ़ाते हुए इस विनीत युवती से शादी करूँ और इसकी इज्ज़त को बचाने के लिए यह कार्य ईश्वर के आदेश से करूँ। माँ और बेटी के चेहरे पर ईश्वरीय प्रसाद पाने की झलक उभर चुकी थी। बस उस दिन के बाद इस बाबा के सारे प्रपंच स्वाह हो गए। वो दोस्त या भक्त फिर सालों तक मुझसे नहीं मिला, कई वर्षों के बाद उसने शादी कर ली, लेकिन उसने मेरी खबर नहीं ली और न ही मैंने उसकी ज़िंदगी के बारे में भी कोई ज़्यादा न सोचा। मैंने इसी लड़की की परवरिश की, इसे वह सब खुशियाँ दी जो मैं अपने बच्चे को दे सकता था।
‘‘मैंने कोई और संतान भी पैदा नहीं की लेकिन अब मेरी जिंदगी में भूचाल आ गया है, वह व्यक्ति अपनी बेटी को ढूँढता हुआ मेरे घर तक आ पहुँचा है। वह सारे राज़ खोल देना चाहता है, वह मुझे स्वार्थी समझ रहा है, वह मुझे पाखंडी कहता है। वह अपनी लड़की को वापिस माँग रहा है अगर अब मैं वर्षों पहले हुई बात को उछालता हूँ तो मेरी पत्नी की एक ग़लती के सारे राज़ खुल जाएँगे पर मैं अगर उसकी बात मानता हूँ तो लड़की के साथ अन्याय होगा। मेरा मार्गदर्शन करो! हे दिव्य आत्मा! मैं ज़िंदगी की मँझधार में हूँ, मैं उस सनकी व्यक्ति को अपनी ज़िंदगी से दूर करना चाहता हूँ। इंसानी हसरतों के इस खेल में मैं हारता जा रहा हूँ।’’
बाबा ने अपनी आँखें बंद की और फिर कुछ पल के बाद आँखें खोली , ‘‘मैं देख रहा हूँ श्रीमान कि वह पागल व्यक्ति किसी भी हद तक जाने को तैयार है, उसे अपनी इज्ज़त की कोई परवाह नहीं पर वह तुमसे बदला लेना चाहता है, उसके सिर पर भूत सवार हो गया है अपनी बेटी को पाने का। और अगर वह कोर्ट में चला गया तो फिर समस्या उलझ सकती है, शायद तुम्हारी बेटी तुम्हारे पास रहे पर ये बात सारे जग को पता चल जाएगी।’’
‘‘मुझे अभी भी शंकाएँ घेर रही हैं।’’ उदास सी आवाज में बाबा के बहुत नज़दीक बैठे व्यक्ति ने कहा।
‘‘तुमने ठीक कहा है बेचारे व्यक्ति! इंसानी हसरतों का तुम्हारे आस पास सजे खेल में मैं भी पहली बार अपनी कला को हारता हुआ देख रहा हूँ। फिर भी मैं तुम्हारी अंतरात्मा के बोझ को हटाना चाहते हुए यह कहता हूँ कि ये लड़की उसे लौटा दो, घर तो उसका भी सूना ही रहा है। वह तुमसे बड़ा अपराधी न था, जितने तुम हो, जिसने उसे गलत सलाह दी थी। कुछ पल उसे खुशियाँ लेने दो, इसमें ही तुम्हारी भलाई है। इसमें तुम्हारा भी प्रायश्चित भी हो रहा है।’’
विनीत व्यक्ति के चेहरे पर उदासी बढ़ने लगी लेकिन वह मायावी बाबा की सलाह से कुछ शंकित था वह खुले मन से इसके विरोध में नहीं था। पर चिंतन उसके मस्तिष्क में गतिशील था। जिस बाबा की कुटिया में हमेशा इच्छाओं का प्रवाह बढ़ता है आज उसी कुटिया में अब इच्छाओं के पतन का प्रवाह दौड़ने लग पड़ा है।
‘‘ नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकता।’’ उसने आखि़र अपना फ़ैसला बाबा को सुना दिया, ‘‘मैं अपने लिए व उस मतलबी आदमी की इच्छाओं के लिए इस वक्त उठे ज्वारभाटे के बीच अपनी लड़की को झोंक नहीं सकता। मैं जीवन के स्वप्न को तोड़ दूँगा, बस आप मुझे इजाज़त दो, मैं क्षमा चाहता हूँ कि मैं सलाह से सहमत नहीं हूँ पर मैं आपका कृतज्ञ ज़रूर हूँ कि मुझे अपनी बात को सुनाने के लिए किसी मायावी और ध्यान में डूबे व्यक्ति का साथ मिला।’’
मायावी बाबा के चेहरे पर मुस्कान आ चुकी थी, ‘‘ तुम सफल हुए पुन्य आत्मा, मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ तुम चेतन में जी रहे हो, कोई मायावी बाबा मनुष्य के जागृत चेतन से बड़ा नहीं होता। ज़िंदगी आनंद है संघर्ष और जीवन उत्सव है, चेतनता भी। वह अवचेतन व्यक्ति अब कभी तुम्हारे पास अपने अतीत के हिस्से का बंटवारा करने नहीं आएगा। उठो, अपने रास्ते पर निकल जाओ।’’
तभी बाबा के बगीचे में घूमती हुई युवती हर पौधे की सरंचना को निहार कर, चीड़ के पेड़ों के बीच दुबके, उगती छोटी झाड़ियों पर निगाह डालकर अपने पापा के पास पहंुंच चुकी थी। ‘‘चलो बेटी, हमें अब निकल पड़ना होगा, देखो सामने धार के पीछे सूरज छिपने की कोशिश करने वाला है, उसकी सुनहरी आखिरी रोशिनियां दूर वादियों में फैल रही हैं। अगर तुम कुछ चुगना चाहती हो तो मैं तुम्हारा साथ देने को तैयार हूँ।’’
मायावी बाबा ने उनको दूर तक जाते देखा उसने फिर से आँखें मूंद ली। बाबा की समृतियों में काले बादल आँखों के भीतर के आसमान में छाने लगे।
पूर्व में किए कई कर्म समृतियों से निकलकर दृश्य सजाने लगा। बाबा जैसे ही आँखे बंद करता भूतकाल के कई प्रसंग उसके सामने आ जाते। कई भक्तों के चेहरे आने लगते। उसकी भक्तांे को वहीं बातें सुनाई देने लगती और उन बातों में सैंकड़ों कमियाँ नज़र आने लगती। वह उठ खड़ा हुआ और कुटिया की सफाई करने लगा। दूसरे दिन जब वह फिर से ध्यान में आँखें बंद करके बैठा, फिर वही सब कुछ होने लगा। कोई भक्त आता तो उसकी आँखों में अँधेरे के सिवा कुछ नज़र नहीं आता। वह भक्त को कुछ बातों में टाल कर वापिस भेज देता।
बाबा की भक्ति में यह कौन सा मोड़ आ गया था। उसने सोचा- ‘‘आखिर यह क्या हो रहा है मेरी ध्यान विद्या भटक क्यों रही है, अब जैसे ही मैं आँखें बंद करता हूँ मेरा ध्यान मेरे ही भूतकाल के भक्तों के साथ संवाद में कैसे जुड़ रहा है। मेरी मनोवैज्ञानिक शक्ति जैसे ख़त्म हो गई है वह मुझे छोड़ कर दूर जा चुकी है। मैं अब किसी के मन की बात क्यों नहीं समझ पा रहा हूँ। मुझे तो अब ऐसा लगने लगा पड़ा है कि मुझमें कोई शक्ति थी ही नहीं। भक्त आते मेरे आगे नत्मस्तक होते, उनकी आस्था मुझमें एक अद्वितय नशे का प्रवाह बढ़ाती और मैं जो बोलता वह सत्य वचन बन जाते। वे बेचारे अपनी आस्था के अभिदूत बनकर चले जाते। मेरा ध्यान मार्ग अब समाप्त हो चुका है। मैं अब किस मार्ग पर चलूँ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि जैसे मैं अब एक साधारण मनुष्य बन गया हूँ, मैं जैसे पहले मायावी नशे में था।’’
वह बार – बार आँखें बंद करके अपनी खोई किसी अद्वितीय शक्ति की तलाश में भटकने लगता पर हर जगह घनघोर अंधेरा छाया हुआ था। सिर्फ उन समृतियों के जंगल उग रहे थे, जहाँ उसने भक्तों को ईश्वर की शक्ति के परिपूर्ण आश्वासन देकर अपने लिए वाहवाही समेटी थी। परत दर परत समृतियों की मोटी तहों से पन्ने पलटते जा रहे थे। ‘‘हे ईश्वर यह तुम्हारा कौन सा प्रपंच है? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।’’
उसके मन ने एक बात की ओर इशारा किया – चाहे तुमने ईश्वर की सत्ता का कण मात्र ही जाना पर तुम तो मायावी पुरुष बन कर जीने लगे, लोगों की इच्छाओं के पालनहार बन बैठे। तुमने तो अपनी मनमर्जी के कई प्रपंच रच डाले। क्या तुम सचमुच एक बाबा हो अगर हो तो फिर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करो, जिन बातों से तुम भोले भाले भक्तों को रिझाते हो वो सब तुम्हारी तीक्ष्ण बुद्धि के विचार हैं। ईश्वर की माया के नहीं, इसलिए तुम्हें अब फिर से विचार करना होगा।
बाबा की कुटिया अब वहाँ नहीं है, बाबा के वर्षों पहले लगाए कुछ पेड़ खड़खड़ा रहे हैं, बाबा जिस पत्थर पर बैठता था, वह पत्थर उदास दुल्हन सा अपने दूल्हे के इंतजार में बरसों बैठा रहा और फिर पत्थर सा हो गया है। अब जब कोई भूला बिखरा राही जब उस जंगल की पगडण्डी से होते हुए कुटिया के अवशेषों के पास से गुजरता है तो उसके मन में इच्छाओं का एक महासागर उमड़ने लगता है इसके साथ ही उसके मन में अनेक अद्वितीय प्रकाश से पूर्ण किरणों का एक आभामण्डल तैयार होता जो उसे एक यांत्रिक जीवन से जागृत हुई बहुत सी आदतों से विपरीत ईश्वर के प्रमाण ढूँढने की शक्ति बाँटता है। उसके मन में एक अनिवार्य विचार पैदा होता है कि अगर मन में उठती इच्छाओं को शांत करना है तो उसे किसी मायावी पुरुष की तलाश अवश्य करनी चाहिए।
वह भय मिटाने वाला सपनों का मनोवैज्ञानिक जादूगर अब कुछ दिनों से कुटिया में नहीं आ रहा है। चहुँ और हाहाकार मच गया है। ईश्वरीय सत्ता से आलिंगन कराने वाले उस साथी को ढूँढने वाले वज्रग्रस्त हो गए हैं सपनों के अँकुरों को सींचकर बड़े पेड़ बनाने वाले उस दिव्य पुरुष के बिना। कुटिया के आसपास बिखरे आकाश और रेंगती ज़मीन में अजीब सी कँपकपाहट शुरू हो चुकी थी। पतझड़ में डूबी शाखों में अब कोई उमंग नहीं थी, वे बसंत के इंतजार की उहापोह में व्यस्त नही थीं। सूर्य की रश्मियाँ अपनी तीव्र इच्छाओं को खो चुकी थीं। वे अपनी आत्मा का सात्विक व्यवहार भूल चुकी थीं। वे मतिभ्रष्ट होकर अपने अलभ्य खजाने को किसी मददगार को बाँटने की अपनी पुरानी उत्कंठा को खो चुकी थीं।
इस सब मायावी अनुभूतियों के अलावा एक बात सबसे महत्वपूर्ण यह होती है कि सिर्फ उन्हीं भक्तों के मन में ये उमंगें उठती हैं जो जीवन के असली हुनर को जानते हैं कि कोशिश करने से ही किसी इच्छा के फलीभूत होने का सबसे पक्का और प्रमाणित सत्य है। आशाओं ने इंसान के जीवन को बचाया है। यह संगीत कुटिया के आसपास के प्रभामण्डल में अब भी साफ़ सुना जा सकता है।

— संदीप शर्मा

*डॉ. संदीप शर्मा

शिक्षा: पी. एच. डी., बिजनिस मैनेजमैंट व्यवसायः शिक्षक, डी. ए. वी. पब्लिक स्कूल, हमीरपुर (हि.प्र.) में कार्यरत। प्रकाशन: कहानी संग्रह ‘अपने हिस्से का आसमान’ ‘अस्तित्व की तलाश’ व ‘माटी तुझे पुकारेगी’ प्रकाशित। देश, प्रदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताएँ व कहानियाँ प्रकाशित। निवासः हाउस न. 618, वार्ड न. 1, कृष्णा नगर, हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश 177001 फोन 094181-78176, 8219417857