कविता

जीने के लिये मिहनत है करना

जीना है तो मिहनत है करना
कामचोर जीवन में ना बनना
मिहनत दिलाती है जग में मुकाम
मिहनत को अपनाओ रे इन्सान

मिहनत मंजिल पे ले जाता है
मिहनत से उपवन खिल जाता है
मिहनत से मिल जाता है अंजाम
मिहनत को अपना लो रे इन्सान

मिहनत जीवन का है पतवार
मिहनत को बनाया जिसने हथियार
फर्श से अर्श तक पहुँच पाया है
गगन में चाँद को छुकर आया है

मिहनत से उपजता खुशियो का संसार
सफलता का मिलता है रोज त्यौहार
सफल जीवन का जीवन दाता है
स्र्वर्णिम दिन का भाग्य विधाता है

मिहनत जो करता है दिन रात
सुख की होती है तब बरसात
फल पाना है तो मिहनत करना
वर्ना दुःख के साहिल पे रहना

मिहनत से जो लिया किनारा
अंधकार भरा जीवन सारा
मिहनत का ना करना अपमान
जग बनाता है मिहनत से महान

मिहनत का है खेल निराला
मिहनत खोलता है भाग्य का ताला
मिहनत से कर लो      घमासान
मिहनत से जीत लो  जग का मैदान

— उदय किशोर साह

उदय किशोर साह

पत्रकार, दैनिक भास्कर जयपुर बाँका मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार मो.-9546115088