कविता

प्रकृति ने खेला अपना दांव

प्रकृति ने इंसान के बहुत जुल्म सहे

चीर कर उसका सीना कर दिया मजबूर

प्रतिकार पर जब उतर आई प्रकृति

तो अब दर्द होगा तो जरूर

पहाड़ों ने कहा था जीने दो शांति से

मत करो हमारी अस्मत से खिलवाड़

पैसे के पीछे पागल हो गया है आदमी

मैदान बना दिया तहस नहस किए पहाड़

प्रकृति ने ऐसा खेला अपना दांव

उजाड़ दिए कई शहर कई गांव

उखाड़ कर ले गई बड़े बड़े पेड़

जिनसे मिलती थी कभी ठंडी छांव

घर परिवार कई हो गए ज़मींदोज़

किसी ने किया सज़ा किसी को मिली

तरक्की के नाम पर बिगाड़ा जो पर्यावरण

सजा तो मिलनी थी उसी की मिली

कुदरत तो पहले भी करती थी अपना काम

पर्यावरण से नहीं करता था कोई छेड़छाड़

छलनी कर दिया जब पहाड़ों का सीना

तभी तो कुदरत दे रही सब कुछ उजाड़

झुकना पड़ेगा आदमी को टिक नहीं पायेगा

जो किया उसका परिणाम सामने आएगा

मिट जाएगा तबाह हो जाएगा वह लड़ते लड़ते

कुदरत को जो थोड़ा भी आंख दिखायेगा

उफनती नदियां गरजते पहाड़

तू कुछ नहीं सकता इनका बिगाड़

यह मंज़र और भी भयानक नज़र आएगा

सम्भल जा तेरे साथ तेरी सल्तनत को बहा कर ले जाएगा

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र