गीतिका/ग़ज़ल

गजल

जिन्दगी को आजमाना चाहता हूँ
आज खुद को गुनगुनाना चाहता हूँ
टूटना ही दरपनों का है मुकद्दर
आपको इतना बताना चाहता हूँ
मुख्तलिफ रगों में जीवन जी चुका मैं
जिन्दगानी सूफियाना चाहता हूँ
साधना मेरी नियम से चल न पायी
आँख अपनों से चुराना चाहता हूँ
बोध से अपराध के इतना दबा मैं
अब सजा कोई भी पाना चाहता हूँ
प्यार की बारिश अकारण की जिन्होंने
उनको पलकों पे बिठाना चाहता हूँ
और जो नफरत से मुझको देखते हैं
ये गजल उनको सुनाना चाहता हूँ
ना मुझे कहना न आया क्या करूँ मैं
हाँ को अपनी ना बनाना चाहता हूँ
— देवकी नन्दन ‘शान्त’

देवकी नंदन 'शान्त'

अवकाश प्राप्त मुख्य अभियंता, बिजली बोर्ड, उत्तर प्रदेश. प्रकाशित कृतियाँ - तलाश (ग़ज़ल संग्रह), तलाश जारी है (ग़ज़ल संग्रह). निवासी- लखनऊ