शिक्षा एवं व्यवसाय

सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ते राजनेताओं के बच्चे?

जब तक विधायक, मंत्री और अफसरों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते रहेंगे, तब तक सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधरेगी। अनुभव से नीति बनती है, और सत्ता के पास उस अनुभव का अभाव है। स्कूलों में छत गिरने से मासूमों की मौत, किताबों की कमी, अधूरे शौचालय — ये सब आम जनता के हिस्से में ही क्यों? यह समय की मांग है कि जनप्रतिनिधि और अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएँ, ताकि वे खुद देख सकें कि किस शिक्षा व्यवस्था को वे बेहतर बनाने का दावा कर रहे हैं।

देश के किसी भी कोने में जाइए, एक दृश्य लगभग समान मिलेगा —सरकारी स्कूलों की टूटी छतें, जर्जर दीवारें, अधूरी दीवारों पर टंगे नामपट्ट, शिक्षकों की भारी कमी, और बच्चों की आँखों में सपनों की भी क्षीण रोशनी। वहीं दूसरी ओर शिक्षा के नाम पर चमचमाते निजी स्कूल, लाखों की फीस, स्मार्ट क्लास, और सत्ताधारियों के बच्चे उसी में दाखिल। ऐसे में सवाल उठता है — “जो नीति बनाते हैं, क्या उन्हें खुद कभी उस नीति की आग में तपना पड़ता है?”

सत्ता और शिक्षा का यह विभाजन
राजस्थान के कोटा में प्रकाशित यह रिपोर्ट एक कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। जब पत्रकारों ने मंत्रियों, विधायकों, अफसरों से पूछा कि क्या उनके बच्चे या पोते-पोतियाँ सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, तो अधिकतर जवाब आया — “नहीं, हमारे बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं” या “अभी स्कूल जाने योग्य नहीं हैं”। क्या यही जवाब किसी आम नागरिक का होता? अगर मंत्री या कलेक्टर के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में जाते, तो क्या स्कूल की छतें गिरी होतीं? क्या मासूम बच्चे मलबे में दबकर मरते? क्या आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियाँ सिर्फ इसलिए स्कूल छोड़ देतीं क्योंकि वहाँ शौचालय नहीं है?

सत्ता को अनुभव नहीं, सिर्फ आँकड़े चाहिए
नीति निर्धारण अब आंकड़ों की बाज़ीगरी बनकर रह गया है। शिक्षा बजट में वृद्धि, स्कूलों की संख्या, छात्रवृत्तियों के नाम पर योजनाएँ — सब कुछ एक रिपोर्ट कार्ड की तरह पेश किया जाता है। मगर ज़मीनी हकीकत क्या है? शिक्षक चार जिलों की दूरी तय करके ड्यूटी करते हैं, स्कूलों में पीने का पानी तक नहीं, बच्चों को किताबें समय पर नहीं मिलतीं। और सबसे बड़ी विडंबना — इन हालातों को सुधारने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के हाथ में है, जिनके अपने बच्चे इन हालातों से अछूते हैं।

क्या होना चाहिए अनिवार्य?
आख़िरकार यह सवाल बार-बार उठता है —
“जब तक मंत्रियों, विधायकों और प्रशासनिक अधिकारियों के अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक सुधार की कोई भी कोशिश दिखावटी होगी।” क्या यह कानूनन अनिवार्य नहीं किया जा सकता कि: विधायक/सांसद बनने के लिए उम्मीदवार को यह शपथ लेनी होगी कि उसका बच्चा सरकारी विद्यालय में ही पढ़ेगा। सरकारी अधिकारियों(IAS/IPS/IRS) की पदस्थापना की शर्त में शामिल हो कि वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में नहीं भेजेंगे। जिन शिक्षकों के बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं, उन्हें पहले अपने स्कूल पर भरोसा दिखाना होगा। यह कोई सनकी मांग नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में समानता और जवाबदेही का आधार है। जब आम नागरिक को सरकारी सेवाओं से संतुष्ट रहने की सलाह दी जाती है, तो नीति-निर्माताओं के लिए भी वह संतोष अनिवार्य क्यों नहीं?

आशा और आक्रोश का संगम
हमें यह स्वीकार करना होगा कि आम जनता की चुप्पी ही सबसे बड़ा अपराध बन चुकी है। जब कोई बच्चा सरकारी स्कूल की जर्जर छत के नीचे दम तोड़ता है, तब सिर्फ अफसोस जताने से कुछ नहीं बदलता। जब तक हम यह नहीं कहेंगे — “पहले आपके बच्चे इस स्कूल में पढ़ें, फिर हमें यहाँ भेजिए,” तब तक शिक्षा सिर्फ चुनावी वादा बनी रहेगी।

वास्तविक उदाहरणों की मांग
दिल्ली सरकार ने कुछ हद तक यह पहल की कि उनके मंत्री सरकारी स्कूलों में समय-समय पर निरीक्षण करें, लेकिन निरीक्षण और अनुभूति में जमीन-आसमान का फर्क है। जो माँ-बाप हर दिन अपने बच्चे को पानी की बोतल के साथ भेजते हैं, वे सरकारी स्कूलों की सूखी टंकी नहीं समझ सकते। जो बच्चे हर दिन निजी बस से स्कूल जाते हैं, उन्हें स्कूल वैन की कमी कभी नहीं चुभेगी।

मीडिया की भूमिका
यह बात सराहनीय है कि दैनिक भास्कर जैसे समाचार पत्र इस विषय को सामने ला रहे हैं। जब मुख्यधारा मीडिया तमाशे और सनसनी से आगे बढ़कर व्यवस्था के मूल पर चोट करता है, तब जागरूकता की शुरुआत होती है। ऐसे प्रयासों को और मजबूत करने के लिए ज़रूरी है कि हम, आप और हर पाठक इसे जन-चर्चा का हिस्सा बनाएँ।

एक आम नागरिक की घोषणा
हर मतदाता को आने वाले चुनावों में यह एक सवाल तय करना चाहिए —”आपका बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ता है या नहीं?” यदि नहीं, तो उसे हमारे बच्चों के भविष्य की योजनाएँ बनाने का अधिकार नहीं।

शिक्षा के लोकतांत्रिककरण की माँग
शिक्षा सिर्फ सेवा नहीं, यह लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। और जब यह स्तंभ एक वर्ग विशेष के लिए ‘निजी सुविधा’ और बाकी देश के लिए ‘सरकारी मजबूरी’ बन जाए, तो असमानता अपने चरम पर होती है।

सरकारी स्कूल तब तक नहीं सुधरेंगे,
जब तक उनकी छतों के नीचे
‘किसी मंत्री का बेटा’ किताब न खोले।
जब तक कोई ‘अफसर की बेटी’
लाइन में खड़े होकर मिड डे मील न खाए।
जब तक कोई ‘विधायक का पोता’
ब्लैकबोर्ड पर ABCD न लिखे।

शिक्षा का अधिकार केवल किताबों में नहीं, सच्चाई में होना चाहिए। यदि हम सच में चाहते हैं कि सरकारी स्कूल सुधरें — तो पहला सुधार वहीं से शुरू होना चाहिए, जहाँ से नीति बनती है — सत्ता के गलियारों से।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

*डॉ. सत्यवान सौरभ

✍ सत्यवान सौरभ, जन्म वर्ष- 1989 सम्प्रति: वेटरनरी इंस्पेक्टर, हरियाणा सरकार ईमेल: satywanverma333@gmail.com सम्पर्क: परी वाटिका, कौशल्या भवन , बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा – 127045 मोबाइल :9466526148,01255281381 *अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में समान्तर लेखन....जन्म वर्ष- 1989 प्रकाशित पुस्तकें: यादें 2005 काव्य संग्रह ( मात्र 16 साल की उम्र में कक्षा 11th में पढ़ते हुए लिखा ), तितली है खामोश दोहा संग्रह प्रकाशनाधीन प्रकाशन- देश-विदेश की एक हज़ार से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशन ! प्रसारण: आकाशवाणी हिसार, रोहतक एवं कुरुक्षेत्र से , दूरदर्शन हिसार, चंडीगढ़ एवं जनता टीवी हरियाणा से समय-समय पर संपादन: प्रयास पाक्षिक सम्मान/ अवार्ड: 1 सर्वश्रेष्ठ निबंध लेखन पुरस्कार हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी 2004 2 हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड काव्य प्रतियोगिता प्रोत्साहन पुरस्कार 2005 3 अखिल भारतीय प्रजापति सभा पुरस्कार नागौर राजस्थान 2006 4 प्रेरणा पुरस्कार हिसार हरियाणा 2006 5 साहित्य साधक इलाहाबाद उत्तर प्रदेश 2007 6 राष्ट्र भाषा रत्न कप्तानगंज उत्तरप्रदेश 2008 7 अखिल भारतीय साहित्य परिषद पुरस्कार भिवानी हरियाणा 2015 8 आईपीएस मनुमुक्त मानव पुरस्कार 2019 9 इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ रिसर्च एंड रिव्यु में शोध आलेख प्रकाशित, डॉ कुसुम जैन ने सौरभ के लिखे ग्राम्य संस्कृति के आलेखों को बनाया आधार 2020 10 पिछले 20 सालों से सामाजिक कार्यों और जागरूकता से जुडी कई संस्थाओं और संगठनों में अलग-अलग पदों पर सेवा रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 9466526148 (वार्ता) (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) 333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan, Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045 Contact- 9466526148, 01255281381 facebook - https://www.facebook.com/saty.verma333 twitter- https://twitter.com/SatyawanSaurabh