गरीबी की जाति
गरीबी की भी जाति होती है साहब,
वर्ना कम से कम गरीब लोग तो
कायम कर लेते रोटी बेटी का रिश्ता,
तब नहीं करना पड़ता इंतजार
कि कब आएगा सुधारक फरिश्ता।
यहाँ अभावों का भी अपना एक गोत्र है,
भूख की भाषा में भी छिपा कोई सूत्र है,
फटे कपड़ों के पैबंद भी जात पूछते हैं,
सूखे हलक भी पानी का घाट पूछते हैं।
मजदूर का पसीना दोनों का एक जैसा बहता है,
पर समाज उन्हें दो अलग कोनों में रखता है,
थाली खाली दोनों की, दोनों का आँचल गीला है,
फिर भी रीतियों का शिकंजा यहाँ कितना सुरीला है।
शमशान की आग और चूल्हे की राख एक है,
पर टूटी झोपड़ियों में बँटा हुआ इंसान अनेक है,
गरीब ही गरीब का हमदर्द बन नहीं पाता,
रूढ़ियों का पहरा यहाँ कभी ढल नहीं पाता।
वोटों की मंडी में दोनों एक ही भाव बिकते हैं,
पर हकीकत में दोनों दो अलग छोर पर दिखते हैं,
कुचल दी जाती है हर बार वो मासूम सी हसरत,
जहाँ जात के नाम पर खड़ी है सदियों की नफरत।
सिसकियाँ दोनों की एक ही सुर में रोती हैं,
पर साहब,सच तो यही है कि
गरीबी की भी जाति होती है।
— राजेन्द्र लाहिरी
