राष्ट्रीय गीत, आज़ादी का जश्न
तिरंगा लहराया है, गगन ने सर झुकाया है,
आज़ादी का जश्न, हिंदुस्तान मुस्कुराया है।
मंगल पांडे कीललकार,भगत सिंह की रफ़्तार,
बापू की अहिंसा और सुभाष चंद्र की वो धार।
कैसे आज़ादी का जश्न ये सुहाना आया है,
भारत माँ के वीरों ने,अपना लहू बहाया है।
नहीं ये बस पंद्रह अगस्त की तारीख़ पुरानी,
हर कण-कण में बसी है,बलिदान की कहानी।
जाति-धर्म की दीवारों को तोड़कर सब आए हैं,
देख आज़ादी का जश्न,गीत मिलकर गाए हैं।
सदियों की दासतां का बोझ हमने उतार दिया,
विजय के इस जश्न से, जग को सँवार दिया।
अधिकार मिले हैं हमको, अब कर्तव्यों की बारी है,
संविधान की मर्यादा, हम सबकी ज़िम्मेदारी है।
अशिक्षा, भेदभाव कुरीतियों को मिटाना है,
आज़ादी के जश्न में, नया दीप जलाना है।
विज्ञान हो या अंतरिक्ष, अब हम सब आगे बढ़ते हैं,
आत्मनिर्भर भारत का,हर सपना सच हम करते हैं।
यह देश हमारा संतों का, यह भूमि पावा, वीरों की,
आज़ादी का जश्न मनाओ, देखो महक तक़दीरों की।
आवाज़ें गूंज उठी जय हिंद! जय हिंद! के नारों की,
मुश्ताक़ याद करो तुम कुर्बानी भारत मां के लालों की।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
