गीत/नवगीत

सावन मनभावन आयो रे

सावन मनभावन आयो रे,
हरियाली को संग लायो रे,
खुशहाली के ढोल बजाता,
बरखा दुल्हनिया लायो रे,
सावन मनभावन आयो रे।

सूखी तपती प्यासी भू को,
जल को तरसते प्राणी जन को,
सावन की बूंदों से तृप्त कराने,
सावन मनभावन आयो रे।

तीज का पावन पर्व मनाने,
सोलह श्रृंगार कर पिय को रिझाने,
हरियल मेंहदी, हरी चूड़ियां लेकर,
सावन मनभावन आयो रे।

रक्षाबंधन का पर्व सुहाना,
भाई-बहिन का प्रेम मस्ताना,
राखी के कच्चे धागे में लेकर,
सावन मनभावन आयो रे।

भौंरे गुंजारें, कोयल चहके,
बादल बरसें, बिजुरी चमके,
मन-मयूर को हर्षित करने,
सावन मनभावन आयो रे।

वन के वृक्षों की महिमा बताने,
वृक्ष न काटने, नए हैं लगाने,
ऐसे सुहाने संकल्प लेकर,
सावन मनभावन आयो रे।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244