कविता

सावन की उमंग

आया सखी सावन मनभावन,
नन्ही बूंदें भी बन जातीं बड़ी जलधार,
झूले की ऊंची पींग सिखाती है,
छोटी खुशियां भी बन जातीं बड़ा उपहार
सामान्य मत समझो इन नन्ही बूंदों को,
धरा से लिया इन्होंने जल का अनुपम उपहार,
उपकार नहीं भूलीं आई हैं अब ऋण चुकाने,
बन कर बादलों के रूप में पनीली जलधार
सावन की उमंग में पड़ गए अंबुआ पर झूले,
आई बिटिया मायके नेह की सौगात लेके,
चमके बिजुरिया, गरजें-बरसें काले बादल,
दादुर मोर पपीहरा बोले, कोयलिया कूके।
चहुं ओर सावन में हरियाली की छाई छटा,
हरी चूड़ियों ने बढ़ाई शोभा गोरी के शृंगार की,
जीवन में आई बहार प्रकृति नटी मुस्कुराई,
सावन मनभावन ले आया सौगात जलधार की।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244