सावन की उमंग
आया सखी सावन मनभावन,
नन्ही बूंदें भी बन जातीं बड़ी जलधार,
झूले की ऊंची पींग सिखाती है,
छोटी खुशियां भी बन जातीं बड़ा उपहार
सामान्य मत समझो इन नन्ही बूंदों को,
धरा से लिया इन्होंने जल का अनुपम उपहार,
उपकार नहीं भूलीं आई हैं अब ऋण चुकाने,
बन कर बादलों के रूप में पनीली जलधार
सावन की उमंग में पड़ गए अंबुआ पर झूले,
आई बिटिया मायके नेह की सौगात लेके,
चमके बिजुरिया, गरजें-बरसें काले बादल,
दादुर मोर पपीहरा बोले, कोयलिया कूके।
चहुं ओर सावन में हरियाली की छाई छटा,
हरी चूड़ियों ने बढ़ाई शोभा गोरी के शृंगार की,
जीवन में आई बहार प्रकृति नटी मुस्कुराई,
सावन मनभावन ले आया सौगात जलधार की।
— लीला तिवानी
