शिक्षा ही समस्या है
सर्टिफिकेट माँगने का सिलसिला यूँ ही जारी है। कहीं एस.आई.आर. कराकर तो कहीं कुँभ मेले में। लेकिन जो लोग सर्टिफिकेट माँग रहें हैं। वे लोग खुद सँदेह के घेरे मे हैं। सर्टिफिकेट माँगने वाले सर्टिफिकेट देने में आना-कानी करते हैं। फिर लोगों से सर्टिफिकेट भी माँग रहे हैं। शिक्षा अब समस्या बनी हुई है। स्कूल काॅलेज उगाही के अड्डे बने हुए हैं। यहाँ परीक्षा से लेकर खेलकूद और फर्नीचर के रख-रखाव का भी चार्ज जोड़ा जा रहा है। स्कूल काॅलेज न हुए दुकान हो गए। हर बात में पैसा देते जाइए।और परीक्षा लेने वाला प्रशासन सर्टिफिकेट पर मुँह चुराता फिरता है। किसी तरह सेशन चार की जगह छ: सात सालों में पूरा होता है।
सर्टिफिकेट की बात होती है तो सर्टिफिकेट यात्रा पर मिलती है। जो कभी छात्रों तक पहुँचती ही नहीं है। परीक्षाएँ हमेशा लीक रहती हैं। डाॅक्टर फिक्स-ईट वालों को इसका भी कोई परमानेंट सलूशन निकालना चाहिए। कोई ऐसा फिक्स ईट जिससे परीक्षा की लिकेज वाली समस्या खत्म हो जाए। लेकिन इसका जो तोड़ है वो माननीयों के पास है। माननीय कभी परीक्षा समय पर होने ही नहीं देते। हो भी गई तो पेपर लीक हो जाता है। पेपर लीक में भी मलाई है। जो माननीय खाते हैं। हर जगह उनका कमीशन फिक्स है। बिना उनकी मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता। ये तो फिर भी परीक्षा है।
परीक्षा और लीक का मामला अब न्यायालय में चला जाता है। यहाँ भी वसूली होती है। न्यायालय दर असल वसूलालय है। यहाँ भी वसूली होती है। यहाँ भी सब पढ़े-लिखे लोग हैं। लेकिन वसूली से बाज नहीं आते। कारण कि वसूली पढ़े-लिखे लोग करते हैं। अब न्यायालय के चक्कर लगाते रहिए। लेते रहिए तारीख- पर -तारीख। फिर बारी आती है, माननयीयों के सगे- संबंधियों की। उनसे सीट बचे तब तो लोग बहाल हों। इधर लीक की मलाई भी माननीय ही खाते हैं। वे स्वंय-भू हैं, वे निर्विकार हैं। वे कण- कण में बसते है़ंं। जिनका यशोगान पूरी धरती पर होता है। जो सूक्ष्म से जयादा स्थूल हैं। जो निर्गुण भी हैं, विकार भी।
इसलिए शिक्षा ही समस्या बन ग ई है। लिहाजा लोग सांसारिकता से निकल रहे हैं। लोगों को लगता है कि बाबा बनकर उनकी समस्याओं का अंत हो सकता है। लिहाजा बाबा बनकर ही बाकी का जीवण बिताना चाहिए। लेकिन बाबा बनना अब इतना आसान नहीं रह गया है। जो लोग बाबा बन गए हैं। उनको भी डँडों से पीटा जा रहा है। बाल योगियों को ये सब बेकार के लफड़ों में पड़ने से मना किया जा रहा है। बाल योगियों को डाॅक्टर इंजीनियर बनने की सलाह दी जा रही है। भाई ये तो यू-टर्न लेने की बात हो रही है। जहाँ से छोड़ा था, फिर से वहीं से शुरूआत करने को कहा जा रहा है। अरे भाई साहब आपके कहने के बाद ही ये लोग मूव हुए हैं। ये मानकर कि शिक्षा, शिक्षा नहीं। बल्कि शिक्षा ही समस्या है। अब थूककर कौन चाटता है।
— महेश कुमार केशरी
