कविता

स्वयं को जीतने की राह

जो रोज़ स्वयं को परखता,वही निखरता जाता है,
अपनी हर कमी को समझकर, सुधारता जाता है।
दर्पण में खुद का चेहरा नहीं,चरित्र तलाशता है,
ऐसा इंसान हर परिस्थिति में मुस्कुराता जाता है।

जो दूसरों की राह नापे,अपनी राह भूल जाता है,
हर पल बुराई और निन्दा में,अपना सुख गँवाता है।
ईर्ष्या की आग भीतर ही भीतर मन को जलाती है,
दूसरों को गिराने की चाह,खुद को ही गिराती है।

सच्ची जीत वही है,जो अपने कल से बेहतर हो जाए,
हर गलती से सीख लेकर,जीवन थोड़ा सुंदर हो जाए।
दूसरों की कमियाँ गिनने से कोई महान नहीं बनता,
जो खुद को जीत लेता है,उससे बड़ा विजेता नहीं बनता।

प्रसन्नता फूल नहीं,अच्छे विचारों की खुशबू है,
संतोष की मीठी धुन और आत्मसुधार की आरज़ू है।
मन में जब ईर्ष्या नहीं,तो हर दिन त्योहार बन जाता है,
जो खुद को बदलता है,उसका संसार सँवर जाता है।

दूसरों की निन्दा छोड़,खुद से सवाल किया कर,
हर शाम अपने कर्मों का थोड़ा-सा हिसाब किया कर।
किशन कल से बेहतर बनने की छोटी-सी कोशिश कर,
खुश रहना है तो दुनियाँ नहीं,पहले स्वयं को जीता कर।

— किशन सनमुखदास भावनानी

*किशन भावनानी

कर विशेषज्ञ एड., गोंदिया

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