एक अमिट शृंगार
नभ-मण्डल से उतरी ज्योत्स्ना,
रची विधाता ने यह तृष्णा।
तुम अनंत शृंगार-प्रतीक,
गरिमामय सौन्दर्य अतीक॥
अचल आस्था के आधार,
मम स्वप्नों के भव्य आकार।
नक्षत्रों की मौन पुकार,
तुम पावन अनुराग-विहार॥
राधा सा निश्छल अनुराग,
रुक्मिणी सा पाणिग्रहण-भाग।
त्याग-तपस्या का हर रूप,
धर्म-रक्षक यह भाव अनूप॥
आत्म-वंदना देह-समर्पण,
तुमको सर्वस्व यह अर्पण।
हृदय-तंत्र की मधुर तरंग,
सहगामिनी मैं सदा प्रसंग॥
सुख-दुःख की संजीवनी-रूप,
अर्पित सप्त-जन्म भव-कूप।
स्नेह-धरा पर घन की धार,
तुम विधाता का काव्य-उदार॥
— सविता सिंह मीरा
