Author: जय प्रकाश भाटिया

कविता

मज़दूर

भगवान ने तन दिया , भगवान ने मन दिया साथ में दे दिया एक पेट, पेट देकर किया मज़बूर , इंसान बन गया मज़दूर, जो सचमुच इंसान है, जिसका आसरा भगवान है, वह बेचारा, रोज़ रोज़, दिन रात कड़ी मेहनत  करता है, अपना और अपने परिवार का पेट भरता है, मज़दूर तो मज़दूर है, कितना मज़बूर है, पर कुछ लोग यहाँ ‘मगरूर’ हैं, कैसे भी हो, चोरी से, बईमानी से, या किसी मज़बूर की कुर्बानी से, उन्हें तो बस अपना जेब भरना है, दूसरो का हक़ मार कर, खुदा को भुला कर,

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