बेईमान बहन-भाई और सौतेली मां का ज़ुल्म
वालिद साहब (पिताजी) के इंतक़ाल को अभी चंद ही महीने हुए थे कि घर की फज़ा (माहौल) बिल्कुल बदल गई।
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Read Moreसर्दियों का आग़ाज़ हो चुका था। क़श्मीर की हसीन वादी पर सफ़ेद बर्फ़ की चादर बिछने को बेताब थी। ‘श्रीनगर’
Read Moreमेरी डायरी के ये धूल-धूसरित, उदास पन्ने और उनकी हर पंक्ति में सांस लेती तुम्हारी स्मृतियां…आज फिर मैंने इन्हें पलटा,
Read Moreसुनो!यह शाम आख़िरी तो नहीं,कि जिसके बाद कोई सुबह न हो।अभी तो धड़कनों के बीचजुदाई के दुख का धुआँ ज़रूर
Read Moreशाम ढल रही थी, और रेलवे स्टेशन के पुराने पीपल के पेड़ पर परिंदों का शोर धीरे-धीरे थम रहा था।
Read Moreजीवन के साठ से अधिक वसंत देख लेने के बाद भी फिटनेस और एक अनुशासित दिनचर्या के प्रति सजग रहना
Read Moreचंबल की सुलगती फ़िज़ाओं में सिर्फ़ बारूद की तीखी गंध और ख़ून के कतरे ही नहीं तैरते थे, बल्कि एक
Read Moreयह उस दौर की बात है जब इश्क़ ज़मानों और सरहदों का मोहताज नहीं हुआ करता था, बल्कि दो दिलों
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