Author: डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

भाषा-साहित्य

डर के साये में “सिसकती क़लम”,साहित्य का उद्देश्य, एक निडर बेबाक आवाज़, एक निष्पक्ष दर्पण

साहित्य केवल शब्दों का ताना-बाना या अलंकारों की सजावट नहीं है बल्कि यह समाज की धड़कन, उसकी पीड़ा, उसकी आकांक्षाओं

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भाषा-साहित्य

क़लम, रूह की गहराई और संवेदना के संवाहक : डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’

“साहित्य की असल ख़ूबसूरती उसकी सच्चाई में है, उस ज़मीर की आवाज़ में है जो बेबाक़ होकर, बिना किसी डर

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कविता

ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है

नशीली नज़र उसकी मेरी जानिब,मैं मुस्कुराया था,एक हादसा था हुआ, लोगों इसमें तुम्हारा क्या है।उसको है मुहब्बत,मुझसे, मैं भी उससे

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